पडरौना अंडरपास में इंजीनियरिंग फेल, करोड़ों रुपये पानी में

 

तराई में अंडरपास बनाया, पानी रोकना भूल गये इंजीनियर

🔴 सिधुआ से सबक नहीं, पडरौना में फिर वही चूक

🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। रेलवे प्रशासन द्वारा पडरौना नगर में  करोड़ों रुपये की लागत से बनाया गया अंडरपास इंजीनियरों की लापरवाही व मनबढई के कारण तकनीकी खामी का शिकार  हो गया है।जमीन के भीतर से पानी निकलने के कारण अंडरपास में लगातार भरा पानी जिम्मेदारो को मुंह चिढा रहा है। इससे निर्माण की गुणवत्ता, भूजल स्तर के आकलन, जलरोधी तकनीक और पानी की निकासी की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। तराई क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति से परिचित होने के बावजूद व सिधुआ अंडरपास की बदहाली से वाकिफ होने के बाद भी यदि निर्माण के दौरान भूजल के दबाव और जलनिकासी की समस्या का समुचित समाधान नहीं किया गया, तो यह इंजीनियरिंग की बड़ी चूक है। अब सवाल है कि इस तकनीकी चूक की जिम्मेदारी कौन लेगा और जनता की गाढ़ी कमाई से हुए संभावित नुकसान की भरपाई कैसे होगी?

बतादे कि कुशीनगर जनपद तराई क्षेत्र में आता है। यहां कई स्थानों पर भूजल स्तर काफी ऊपर होने के कारण जमीन की खुदाई के दौरान पानी मिलने की संभावना रहती है। ऐसे क्षेत्र में भूमिगत अंडरपास बनाना सामान्य निर्माण कार्य नहीं, बल्कि भू-तकनीकी इंजीनियरिंग की गंभीर परीक्षा है। निर्माण से पहले मिट्टी की प्रकृति, मौसमी भूजल स्तर, भूमिगत जल का दबाव, संरचना की स्थिरता और जलनिकासी की क्षमता का आकलन करना जरूरी है।ऐसे में रेलवे के इंजीनियरों से सीधा सवाल है कि क्या पडरौना अंडरपास का डिजाइन तैयार करने से पहले इन सभी पहलुओं का समुचित अध्ययन किया गया था? क्या अधिकतम संभावित भूजल स्तर को ध्यान में रखकर संरचना का डिजाइन बनाया गया?क्या दीवारों, फर्श और निर्माण के जोड़ों को पानी के दबाव के अनुरूप जलरोधी बनाया गया? क्या जलनिकासी के लिए पर्याप्त क्षमता वाले पंप, संप वेल और आपातकालीन व्यवस्था सुनिश्चित की गई?यदि ये व्यवस्थाएं डिजाइन में थीं, तो जमीन के भीतर से पानी प्रवेश करने और अंडरपास में जलभराव की समस्या क्यों सामने आई? और यदि ये व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं थीं, तो डिजाइन को तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?

🔴इंजीनियर की जिम्मेदारी सिर्फ नक्शा पास करने तक नहीं

किसी भी सार्वजनिक निर्माण में जिम्मेदारी केवल ठेकेदार की सामग्री या मजदूरी तक सीमित नहीं होती। डिजाइन तैयार करने वाले इंजीनियर, तकनीकी स्वीकृति देने वाले अधिकारी, निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी करने वाले अभियंता और कार्य को निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रमाणित करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।रेलवे प्रशासन यह स्पष्ट करे कि पडरौना अंडरपास के निर्माण में किस इंजीनियर की क्या भूमिका थी। किसने भू-तकनीकी रिपोर्ट का परीक्षण किया? किसने जलरोधी प्रणाली और जलनिकासी की डिजाइन स्वीकृत की? किस अधिकारी ने निर्माण की गुणवत्ता की जांच की? और किसके प्रमाणन के बाद कार्य को स्वीकार किया गया? यदि तकनीकी जांच में साबित होता है कि किसी इंजीनियर ने जरूरी सर्वेक्षण नहीं कराया, भूजल के दबाव का गलत आकलन किया, निर्धारित तकनीकी मानकों की अनदेखी की अथवा स्पष्ट खामियों के बावजूद निर्माण को स्वीकृति दी, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए। क्योंकि सरकारी पद पर बैठने का मतलब यह नही है कि उसे जिम्मेदारी से छूट पाने का प्रमाण पत्र मिल गया है।

🔴 सिधुआ अंडरपास की विफलता से सबक क्यों नहीं ?

कहना ना होगा कि सिधुआ अंडरपास में निर्माण के बाद से जलभराव बने रहने और उसके चालू नहीं हो पाने की स्थानीय शिकायतें भी सामने आती रही हैं। यदि वहां की समस्या का तकनीकी समाधान नहीं हुआ, तो पडरौना के अंडरपास की योजना बनाते समय उस अनुभव का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? विशेषज्ञों का कहना है कि रेलवे को दोनों अंडरपास की स्वीकृत डिजाइन,भू-तकनीकी रिपोर्ट, जलनिकासी व्यवस्था और गुणवत्ता परीक्षणों का तुलनात्मक तकनीकी ऑडिट कराना चाहिए। साथ ही यह पता लगाया जाना चाहिए कि दोनों जगह जलभराव के कारण समान हैं या अलग-अलग। यदि दोनों परियोजनाओं में एक जैसी तकनीकी कमियां पाई जाती हैं, तो यह भी जांच होनी चाहिए कि क्या विभाग ने पिछली विफलता से सबक लेने के बजाय वही गलतियां दोहराईं।

🔴 जनता की गाढ़ी कमाई का नुकसान हुआ तो वसूली भी हो

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी इंजीनियर की तकनीकी चूक, लापरवाही या मानकों की अनदेखी के कारण यदि नई बनी संरचना अनुपयोगी होती है और उसे दुरुस्त करने के लिए दोबारा सरकारी धन खर्च करना पड़ता है, तो उस नुकसान की जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।रेलवे प्रशासन को निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच करानी चाहिए। यदि जांच में संबंधित इंजीनियर या अन्य अधिकारी की प्रमाणित लापरवाही सामने आती है और उससे सरकारी खजाने को आर्थिक नुकसान हुआ है, तो लागू सेवा नियमों और कानून के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ नुकसान की वसूली की प्रक्रिया भी शुरू की जानी चाहिए। इसके अलावा ठेकेदार की भी जिम्मेदारी बनती है, उसके विरुद्ध भी अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई की जाए।जानकार बताते है कि सिर्फ पंप लगाकर पानी निकाल देना, दीवारों पर मरम्मत कराना या अस्थायी इंतजाम कर देना पर्याप्त नहीं है। पहले यह तय हो कि मूल चूक कहां हुई, उसे किसने नजरअंदाज किया और उसे सुधारने में कितना अतिरिक्त खर्च हो रहा है। इसके बाद नियमानुसार जिम्मेदार पक्ष से वसूली की जाए। जनता के पैसे से हुई गलती का पूरा बोझ फिर जनता पर डाल देना जवाबदेही नहीं है।

🔴 डिजाइन में चूक थी या निगरानी में?

पडरौना अंडरपास में जलभराव की समस्या को लेकर रेलवे प्रशासन को सार्वजनिक रूप से बताना होगा कि निर्माण पर कुल कितनी लागत आई, परियोजना की तकनीकी स्वीकृति किसने दी, जलनिकासी की मूल व्यवस्था क्या थी और समस्या सामने आने के बाद उसके स्थायी समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।साथ ही सिधुआ अंडरपास की मौजूदा स्थिति, उसके चालू नहीं होने के कारण और अब तक किए गए सुधार कार्यों का विवरण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।मामले की जांच केवल ठेकेदार तक सीमित न रहे। डिजाइन तैयार करने वाले इंजीनियर से लेकर तकनीकी स्वीकृति देने, निर्माण की निगरानी करने और कार्य को प्रमाणित करने वाले अधिकारियों तक की भूमिका की जांच होनी चाहिए।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य


 

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