🔵एजुकेटर भर्ती: ‘नोट’ के दम पर काउंसलिंग का खेल?
🔴 वेबसाइट पर विज्ञापन, अखबारों में नदारद! एजुकेटर भर्ती की काउंसलिंग पर सवाल
🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर।एजुकेटर की नियुक्ति में पारदर्शिता के लिए शासन ने चयन से लेकर काउंसलिंग तक की पूरी प्रक्रिया तय कर रखी है, बावजूद इसके कुशीनगर जिले में इस प्रक्रिया को दरकिनार कर काउंसलिंग कराए जाने के आरोपों ने भर्ती व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि उन्हें काउंसलिंग की सूचना तक नहीं दी गई, जबकि चुनिंदा अभ्यर्थियों को सूचना देकर बुलाया गया और काउंसलिंग करा ली गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब शासन ने मेरिट के आधार पर क्रमवार काउंसलिंग का स्पष्ट प्रावधान निर्धारित कर रखा है तो आखिर किन अभ्यर्थियों को सूचना देकर बुलाया गया और किन्हें बाहर रखा गया?
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि कंपनी और बीएसए कार्यालय के कुछ जिम्मेदारों की मिलीभगत से कथित रूप से उन्हीं अभ्यर्थियों को काउंसलिंग की जानकारी दी गई, जिनसे पैसे लिए गए थे। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन सच है तो यह केवल भर्ती में अनियमितता नहीं बल्कि शासन द्वारा निर्धारित पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल है।
🔴 शासन की गाइडलाइन में सब कुछ है तय
शासनादेश व चयन गाइडलाइन के अनुसार संविदा एजेंसी का चयन जेम पोर्टल के माध्यम से किया जाना है। इसके बाद एजेंसी द्वारा उपलब्ध कराए गए अभ्यर्थियों की सूची के आधार पर जिलास्तरीय समिति मेरिट तैयार करती है।गाइडलाइन में स्पष्ट है कि मेरिट सूची हाईस्कूल, इंटर, स्नातक, डीपीएड, एनटीटी एवं संबंधित डिप्लोमा की निर्धारित शैक्षिक योग्यता के अंकों के प्रतिशत के योग के औसत के आधार पर तैयार की जाएगी। यानी चयन में मेरिट कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया का मूल आधार है। इतना ही नहीं, दो या दो से अधिक अभ्यर्थियों के अंक समान होने की स्थिति में भी वरीयता का क्रम निर्धारित किया गया है। पहले अधिक आयु वाले अभ्यर्थी को वरीयता और उम्र भी समान होने पर अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम से वरीयता देने का प्रावधान है। सवाल यह है कि कुशीनगर में तैयार की गई मेरिट सूची क्या सार्वजनिक की गई? यदि नहीं तो क्यों? और यदि मेरिट सूची तैयार हुई तो काउंसलिंग की सूचना उसी मेरिट क्रम के अनुसार सभी पात्र अभ्यर्थियों को क्यों नहीं दी गई?
🔴काउंसलिंग का भी तय है ‘क्रम’, मनमानी की गुंजाइश कहां?
गाइडलाइन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा काउंसलिंग से जुड़ा है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि तैयार मेरिट सूची में अभ्यर्थियों को संबंधित जनपद के सभी चयनित विद्यालयों की सूची दी जाएगी। अभ्यर्थी अपनी पसंद के विद्यालय का चयन करेगा। यदि पहले अभ्यर्थी द्वारा विद्यालय चुन लिया जाता है तो अगले अभ्यर्थी के सामने शेष विद्यालय प्रस्तुत किए जाएंगे।यानी काउंसलिंग मेरिट क्रम के अनुसार आगे बढ़नी चाहिए, न कि मनमाने तरीके से चुनिंदा लोगों को बुलाकर।ऐसे में अगर आरोप के मुताबिक कुछ अभ्यर्थियों को सूचना ही नहीं दी गई और दूसरी तरफ कुछ अभ्यर्थियों को बुलाकर काउंसलिंग करा दी गई तो यह जांच का सीधा विषय है कि काउंसलिंग किस मेरिट क्रम में हुई और किन अभ्यर्थियों को किस आधार पर सूचना भेजी गई?
🔴दस्तावेज सत्यापन भी अनिवार्य फिर गोपनीयता क्यो?
गाइडलाइन के मुताबिक एजेंसी द्वारा उपलब्ध कराई गई अभ्यर्थियों की सूची में दर्ज शैक्षिक योग्यताओं के प्रमाणपत्रों का मूल अभिलेखों से मिलान कर सत्यापन किया जाना है। किसी विसंगति की स्थिति में मेरिट सूची में आवश्यक संशोधन का भी प्रावधान है।इसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को जिलाधिकारी की स्वीकृति के बाद समिति के सदस्य सचिव यानी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की उपस्थिति में उसी दिन एजेंसी द्वारा ऑफर लेटर दिए जाने की व्यवस्था है।इस पूरी प्रक्रिया में जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति की भूमिका भी निर्धारित है। समिति में जिलाधिकारी अध्यक्ष तथा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के प्राचार्य, जिला सेवायोजन अधिकारी, वित्त एवं लेखाधिकारी बेसिक शिक्षा और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी समेत अन्य सदस्य शामिल हैं।
🔴 एनआईसी पर विज्ञापन, अखबारों में नदारद
भर्ती प्रक्रिया का दूसरा पहलू भी कम गंभीर नहीं है। एनआईसी की वेबसाइट पर जिन समाचारपत्रों में विज्ञापन प्रकाशित किए जाने का उल्लेख बताया जा रहा है, अभ्यर्थियों का दावा है कि संबंधित अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित ही नहीं हुआ। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस विज्ञापन के आधार पर अभ्यर्थियों को भर्ती की जानकारी मिलनी थी, उसका वास्तविक प्रकाशन हुआ भी था या केवल रिकॉर्ड में प्रकाशन दिखाया गया?क्योंकि व्यापक विज्ञापन का उद्देश्य ही यही है कि प्रत्येक पात्र अभ्यर्थी को समान अवसर मिले। विज्ञापन सीमित लोगों तक पहुंचा और फिर उन्हीं में से काउंसलिंग कर दी गई तो मेरिट आधारित चयन का उद्देश्य ही प्रभावित हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि इन बिन्दुओ पर जांच होती है तो दूध का दूध पानी का पानी साफ हो जायेगा। सवाल यह है कि एजेंसी को अभ्यर्थियों की सूची किस तारीख को उपलब्ध कराई गई?पूरी मेरिट सूची किस आधार पर तैयार हुई?मेरिट सूची में प्रत्येक अभ्यर्थी के अंक और क्रमांक क्या हैं?काउंसलिंग के लिए किस-किस अभ्यर्थी को सूचना दी गई? सूचना भेजने का माध्यम क्या था और उसका रिकॉर्ड क्या है? क्या सभी पात्र अभ्यर्थियों को समान सूचना दी गई?काउंसलिंग किस मेरिट क्रम में कराई गई?काउंसलिंग में उपस्थित और अनुपस्थित अभ्यर्थियों की सूची क्या है?चयनित विद्यालयों की सूची और प्रत्येक विद्यालय के लिए चयनित अभ्यर्थी कौन है?संबंधित समाचारपत्रों में प्रकाशित विज्ञापन की मूल प्रति और प्रकाशन की तारीख क्या है? एजेंसी और विभागीय जिम्मेदारों के बीच चयन प्रक्रिया से संबंधित पत्राचार क्या हुआ?क्या जिलास्तरीय समिति की बैठक हुई और उसकी कार्यवाही दर्ज की गई?
🔴 ‘पैसे लेकर बुलाने’ के आरोप की भी हो जांच
सबसे गंभीर आरोप कथित वसूली का है। अभ्यर्थियों और सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि कुछ लोगों से मोटी रकम लेकर उन्हें काउंसलिंग की सूचना दी गई। यह आरोप फिलहाल आरोप ही है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। लेकिन इस आरोप की जांच भी रिकॉर्ड से संभव है। किसे सूचना मिली, किसे नहीं मिली, मेरिट में किसका क्या स्थान था, काउंसलिंग में किसे बुलाया गया और किसे चयन मिला इन सभी तथ्यों को एक साथ रख दिया जाए तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
🔴मेरिट से चयन होना था या ‘मैनेजमेंट’ से?
शासन की गाइडलाइन ने चयन की राह पहले ही तय कर दी है एजेंसी का चयन जेम पोर्टल से, अभ्यर्थियों की मेरिट, प्रमाणपत्रों का सत्यापन, मेरिट क्रम से काउंसलिंग, समिति की स्वीकृति और उसके बाद ऑफर लेटर।अब सवाल सिर्फ इतना है कि कुशीनगर में भी यही प्रक्रिया जमीन पर उतरी या कागजों तक सीमित होकर रह गई?
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य



