🔴 सरकारी पत्थर पर निजी पहचान की छाप? शिलापट्टों की जांच और खर्च की वसूली का उठने लगा सवाल!
🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर में नपाध्यक्ष किरन जायसवाल के नाम के साथ ‘राकेश’ जोड़कर ‘किरन राकेश जायसवाल’ लिखे जाने का मामला अब महज नाम की वर्तनी का नहीं है, बल्कि सरकारी नियमों और जवाबदेही का सवाल बन गया है। सवाल सीधा है जब निर्वाचित अध्यक्ष का आधिकारिक नाम ‘किरन जायसवाल’ है, तो विकास कार्यों के पत्थरों पर नाम बदलने की इजाजत किसने दी? किस शासनादेश के तहत यह नामांकन हुआ? और यदि जांच में यह नियमों के विरुद्ध पाया जाता है, तो गलत शिलापट्टों को बदलने में सरकारी धन खर्च करने का बोझ आखिर जनता क्यों उठाए? पत्थर पर नाम किसका चमकेगा, यह निजी पसंद से नहीं, शासन के नियमों से तय होता है।
काबिलेतारीफ है कि नगर विकास विभाग ने शिलापट्टों पर जनप्रतिनिधियों के नाम अंकित करने को लेकर बाकायदा दिशा-निर्देश जारी किए हैं। विभाग की वेबसाइट पर 31 जुलाई 2025 का शासनादेश विकास कार्यों के शिलान्यास/शिलापट्ट लगाने तथा 29 मई 2025 का शासनादेश विकास कार्यों में शिलालेख/पट्टिका लगाए जाने से संबंधित है। वहीं जून 2026 में शासन ने व्यवस्था और सख्त करते हुए शिलापट्ट पर अंकित जनप्रतिनिधियों के नाम वाली फोटो को प्रमाणित कराकर अगली किस्त से जोड़ दिया।
🔴नाम सरकारी रिकॉर्ड में एक, शिलापट्ट पर दूसरा किसकी अनुमति से?
कहना ना होगा कि नगर पालिका अध्यक्ष का आधिकारिक नाम सरकारी अभिलेखों में किरन जायसवाल है, जबकि नगर के कई विकास कार्यों के शिलापट्टों पर ‘किरन राकेश जायसवाल’ अंकित है। यहीं से असली सवाल शुरू होता है।अगर यह केवल सामान्य सामाजिक प्रचलन था तो सरकारी विकास कार्यों के स्थायी शिलापट्ट पर इसे अपनाने का लिखित प्रशासनिक आधार क्या है? क्या किसी सक्षम अधिकारी अथवा नगर विकास मंत्रालय की अनुमति ली गई? क्या शिलापट्ट का डिजाइन और नामांकन किसी शासनादेश के अनुरूप स्वीकृत हुआ?और सबसे अहम सवाल यह है कि क्या नगर विकास विभाग के शिलापट्ट प्रोटोकॉल में निर्वाचित महिला अध्यक्ष के नाम के साथ पति का नाम जोड़ने की अनुमति है?
🔴 2012 का शासनादेश : पति को प्रशासनिक भूमिका से दूर रखने के निर्देश
उत्तर प्रदेश शासन के 10 अक्टूबर 2012 का शासनादेश संख्या 3905/नौ-1-2012। के अनुसार स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिला पदाधिकारियों के पति अथवा संबंधियों के निकाय के प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप पूरी तरह वर्जित है।शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि निर्वाचित पदाधिकारी अपने दायित्व स्वयं निभाएंगे और पति अथवा संबंधी को निकाय के प्रशासनिक कार्यों में कदापि शामिल नहीं करेगें। बैठक में भी निर्वाचित अथवा पदेन पदाधिकारियों से भिन्न व्यक्ति को शामिल करने पर रोक संबंधी निर्देश दिए गए हैं।यानी शासन का मूल जोर इस बात पर है कि निर्वाचित पद और उसके अधिकार व्यक्ति विशेष के वैधानिक पद से तय होंगे, पारिवारिक संबंध से नहीं।
🔴 अब सवाल सिर्फ पत्थर का नहीं, सरकारी धन का भी
जानकारो का कहना है कि जांच में यह पाया जाता है कि शिलापट्ट पर नाम निर्धारित प्रोटोकॉल के विपरीत अंकित कराया गया है, तो गलत शिलापट्ट को कौन हटाएगा? नया शिलापट्ट किसके खर्च पर लगेगा? और यदि सरकारी धन से गलत नाम वाला पत्थर बनवाया गया था तो उस पर खर्च हुई धनराशि की जिम्मेदारी किसकी तय होगी? विधि विशेषज्ञों का कहना है कि जांच में किसी व्यक्ति अथवा अधिकारी की जिम्मेदारी और सरकारी धन की अनावश्यक क्षति निर्धारित होती है, तो वसूली और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई का रास्ता खुल जायेगा।
🔴 डीएम साहब! कब होगी जांच और कार्रवाई
जानकारो का कहना है कि अगर जिलाधिकारी स्तर से इन बिन्दुओं पर जांच करा दी जाए तो पूरा सच सामने आ जायेगा। नगर पालिका के आधिकारिक रिकॉर्ड में अध्यक्ष का नाम क्या है? कितने शिलापट्टों पर ‘किरन राकेश जायसवाल’ अंकित कराया गया?प्रत्येक शिलापट्ट किस योजना और किस बजट से बना?शिलापट्ट का प्रारूप किसने तैयार और स्वीकृत किया?क्या ईओ ने शिलापट्ट का सत्यापन किया?क्या शासन के निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत नाम अंकित किया गया? क्योंकि सवाल केवल ‘किरन के साथ राकेश क्यों?’ का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी विकास कार्य के पत्थर पर नाम लिखने की व्यवस्था नियम से चलेगी या किसी के निजी प्रचलन से।


