सूचना पट्ट पर नामों की भरमार, लागत का एक आंकड़ा तक नहींनगर पालिका परिषद कुशीनगर के शिवाजीनगर छठ घाट में लाखों के काम का हिसाब धुँधला, 55 से 90 लाख तक लागत की चर्चाएं; बजट पूछने पर पालिका के बाबू ने झाड़ा पल्ला
🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर। सरकारी धन से होने वाले निर्माण कार्य में सबसे जरूरी चीज होती है—काम की गुणवत्ता और खर्च का खुला हिसाब। लेकिन नगर पालिका परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 19 शिवाजीनगर स्थित छठ घाट पर तस्वीर इसके उलट नजर आ रही है। यहां विकास कार्य का सूचना पट्ट तो लगा है, जनप्रतिनिधियों और कार्यदायी संस्था के नाम भी दर्ज हैं, मगर जिस आंकड़े पर पूरी निगरानी टिकी होती है, वही गायब है—निर्माण की स्वीकृत लागत। लागत का ब्योरा न होने से अब सवाल उठ रहा है कि आखिर इस छठ घाट के सौंदर्यीकरण और इंटरलॉकिंग पर कितनी रकम स्वीकृत हुई और जमीन पर कितना खर्च हुआ? आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं होने से इलाके में 55 लाख से लेकर 90 लाख रुपये तक की लागत की चर्चाएं तैर रही हैं।
🔴सूचना पट्ट पर श्रेय, खर्च का हिसाब गायब
शिवाजीनगर छठ घाट पर लगे सूचना पट्ट पर नगर पालिका परिषद कुशीनगर और राज्य वित्त आयोग का उल्लेख है। जनप्रतिनिधियों के नाम भी प्रमुखता से दर्ज हैं। लेकिन निर्माण की लागत, क्षेत्रफल और अन्य जरूरी तकनीकी विवरण को लेकर स्थिति साफ नहीं है। यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता पर सवाल खड़ा होता है। सार्वजनिक धन से होने वाले निर्माण में यदि जनता को यह तक पता न चले कि काम की स्वीकृत लागत कितनी है, तो वह निर्माण की गुणवत्ता और खर्च की तुलना आखिर किस आधार पर करे? सूचना पट्ट आखिर जनता के लिए है या सिर्फ श्रेय का बोर्ड? यह सवाल अब वार्डवासियों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
🔴 55 लाख, 65 लाख या 90 लाख? आधिकारिक आंकड़ा कौन बताएगा
लागत का आधिकारिक ब्योरा सामने नहीं आने के कारण स्थानीय स्तर पर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। कोई करीब 55 लाख रुपये, कोई 65 लाख रुपये, तो कोई लागत 90 लाख रुपये तक होने की बात कह रहा है। इनमें सही आंकड़ा कौन सा है, इसका जवाब नगर पालिका के पास होना चाहिए। लेकिन मौके पर लगे बोर्ड पर लागत दर्ज नहीं होने और संबंधित जानकारी सार्वजनिक न किए जाने से कयासों को ही जगह मिल रही है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि परियोजना की लागत निर्धारित है तो उसे सार्वजनिक करने में आखिर परेशानी क्या है?
🔴बजट पूछा तो बाबू ने कहा—जानकारी नहीं है, बता भी नहीं सकता
मामले की पड़ताल के दौरान जब नगर पालिका के बाबू राजेश श्रीवास्तव से छठ घाट के निर्माण बजट की जानकारी मांगी गई तो उन्होंने बजट बताने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है और वह बता भी नहीं सकते। यह जवाब अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। जिस नगर पालिका के माध्यम से सार्वजनिक धन खर्च हो रहा है, वहां निर्माण की लागत जानने के लिए आम नागरिक या मीडिया को आखिर किस दरवाजे पर दस्तक देनी होगी?लागत बताने से परहेज और बोर्ड से आंकड़ा गायब—दोनों को जोड़कर देखा जाए तो पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
🔴 निर्माण की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में
वार्डवासियों का आरोप है कि मौके पर कराए गए निर्माण की गुणवत्ता को देखकर खर्च की गई रकम और दिखाई दे रहे काम के बीच बड़ा अंतर नजर आता है। हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण तकनीकी जांच के बाद ही हो सकता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार अधिकारी केवल कागजों में भुगतान और माप पुस्तिका देखने के बजाय मौके पर निर्माण की तकनीकी जांच कराएं। इंटरलॉकिंग को उखाड़कर नीचे की परत, सामग्री की मोटाई, गुणवत्ता और निर्धारित मानकों की जांच हो तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
🔴 ईओ का तर्क भी सवालों के घेरे में
इस संबंध में अधिशासी अधिकारी से उनके मोबाइल फोन पर दो बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।हालांकि इससे पूर्व शिलापट/निर्माण स्थल पर धनराशि और क्षेत्रफल अंकित नहीं होने के सवाल पर ईओ का कहना था कि शिलापट केवल शिलान्यास और लोकार्पण के लिए होता है। उस पर धनराशि और दूरी या क्षेत्रफल लिखना जरूरी नहीं है। उनके अनुसार मिशन आधारित कार्यों में गाइडलाइन होने पर ही ऐसी जानकारी अंकित की जाती है।ईओ के इस तर्क के बाद सवाल और गंभीर हो जाता है—यदि सूचना पट्ट पर लागत दर्ज नहीं की गई तो जनता को परियोजना की स्वीकृत धनराशि की जानकारी आखिर कहां से मिलेगी?
🔴 अब जांच से ही खुलेगा खर्च का राज
छठ घाट जैसी सार्वजनिक परियोजना में धनराशि को लेकर भ्रम की स्थिति खत्म करने का सबसे आसान रास्ता है—स्वीकृति पत्र, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, टेंडर/अनुबंध, एमबी और भुगतान अभिलेख सार्वजनिक कर दिए जाएं। इसके साथ ही मौके पर कराए गए निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच हो। जांच में यदि काम मानक के अनुरूप मिलता है तो तमाम सवाल खुद खत्म हो जाएंगे और यदि गड़बड़ी मिलती है तो जिम्मेदारी भी तय हो सकेगी।फिलहाल स्थिति यह है कि बोर्ड पर नाम हैं, लेकिन लागत नहीं; निर्माण दिखाई दे रहा है, लेकिन खर्च का आधिकारिक आंकड़ा जनता के सामने नहीं। ऐसे में सवाल सिर्फ छठ घाट के निर्माण का नहीं, बल्कि नगर पालिका में सार्वजनिक धन खर्च करने की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता का भी है।अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कयासों पर विराम लगाने के लिए लागत का वास्तविक आंकड़ा सार्वजनिक करते हैं या फिर लाखों रुपये के इस निर्माण का हिसाब भी फाइलों में ही तलाशा जाता रहेगा।
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य
