कुशीनगर नगर पालिका में 'अध्यक्ष पति ' की हनक! किरन के नाम पर राकेश की हुकूमत?

 

🔴कुर्सी पर किरन, सिस्टम में राकेश! नगर पालिका में 'अध्यक्ष पति' की हनक की चर्चा 

🔵युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर इन दिनों अपनी कारगुजारी व कारस्तानी को लेकर खूब चर्चा मे है। चर्चा के सबब है जनता द्वारा निर्वाचित अध्यक्ष किरन जायसवाल के पति राकेश जायसवाल।चर्चा ए सरेआम है कि जनता ने अध्यक्ष पद के लिए किरन जायसवाल को चुना, लेकिन नगर पालिका का सारा कामकाज उनके पति राकेश जायसवाल के निर्देश पर होता है। मतलब यह कि नगर पालिकाके कर्मचारी ही नही बल्कि प्रशासनिक अधिकारी ईओ भी राकेश जायसवाल के हुक्म की तामील करती है। सवाल यह नहीं कि राकेश जायसवाल अध्यक्ष के पति हैं, सवाल यह है कि अध्यक्ष पति होने के नाते उन्हें नगर पालिका के प्रशासनिक और विकास कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार किस शासनादेश व गाइडलाइन से प्राप्त हुआ है ?

विधि विशेषज्ञों की राय माने तो यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि नगर पालिका कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि वैधानिक स्थानीय निकाय है। इसके पास जनता का पैसा आता है और उसी धन से नगर में विकास कार्य कराए जाते हैं। ऐसे में यदि अध्यक्ष के पति सरकारी कामकाज में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं तो न सिर्फ अनाधिकार है बल्कि पूरी तरह नियम विरुद्ध है। ऐसे मे आम लोगो के जेहन मे उठ सवाल भी महत्वपूर्ण है कि राकेश के पास नगर पालिका का कौन सा पद है? अधिकार क्या है? और उन्हें किस शासनादेश के तहत अधिकृत किया गया है। चर्चा-ए-सरेआम है कि नगर पालिका में अध्यक्ष किरन जायसवाल के बजाय उनके पति राकेश जायसवाल की हनक व धमक रहती है। 

🔴अध्यक्ष किरन या 'अध्यक्ष पति' राकेश?

नगरवासियों का कहना है कि नगर पालिका अध्यक्ष किरन जायसवाल हैं और जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है। ऐसे में नगर पालिका के प्रशासनिक निर्णय, बोर्ड की बैठक, विकास कार्यों की निगरानी और सरकारी प्रक्रिया में वैधानिक भूमिका अध्यक्ष और निर्धारित अधिकारियों की होनी चाहिए। लेकिन यहा तो उल्टी गंगा बह रही है। मतलब यह कि नपाध्यक्ष किरन जायसवाल के पति राकेश जायसवाल न सिर्फ इन मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं बल्कि बिना पद के ही 'अध्यक्ष जी. ' कहलाते है। अब सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उन्हें नगर पालिका का कोई संवैधानिक या वैधानिक पद प्राप्त है? यदि नहीं, तो फिर नगर पालिका के अधिकारी और कर्मचारी उनके निर्देशों को किस अधिकार से मानते हैं? 


🔴शिलापट्टों पर 'राकेश' की मौजूदगी ने बढ़ाया सवाल

मामले का एक और दिलचस्प पहलू नगर में लगाए गए विकास कार्यों के शिलापट्ट हैं। नगर पालिका के सरकारी अभिलेखों में अध्यक्ष का नाम किरन जायसवाल दर्ज है, लेकिन शिलापट्टों पर "किरन राकेश जायसवाल" अंकित किया गया है। यानी अध्यक्ष की पहचान के साथ पति का नाम भी सरकारी शिलापट्ट पर पहुंच गया। अब सवाल यह है कि यदि राकेश जायसवाल केवल अध्यक्ष के पति हैं तो सरकारी शिलापट्ट पर उनके नाम को अध्यक्ष के नाम का हिस्सा बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या नगर विकास मंत्रालय ने इसके लिए कोई नियम, अथवा आदेश जारी किया? यदि हां तो वह सामने क्यों नहीं है? और यदि यह केवल सामाजिक प्रचलन है तो फिर सरकारी अभिलेखों में अध्यक्ष का नाम केवल किरन जायसवाल ही क्यों अंकित है?

🔴'अध्यक्ष पति' के लिए कौन सा नियम?

नगर पालिका प्रशासन से सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या "अध्यक्ष पति" अथवा अध्यक्ष प्रतिनिधि नाम का कोई वैधानिक पद नगर पालिका व्यवस्था में है। क्या अध्यक्ष पति/प्रतिनिधि राकेश जायसवाल को नगर पालिका के सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार  है? क्या राकेश जायसवाल को अधिकारियों को निर्देश देने का अधिकार हैं?क्या वह बतौर अध्यक्ष विकास कार्यों की निगरानी कर सकते हैं?क्या वह भुगतान या निर्माण व प्रशासनिक मामलों में अपने निर्णय से बदलवा सकते हैं? क्या वह बोर्ड की बैठकों में अध्यक्ष की ओर से कोई भूमिका निभा सकते हैं? यदि इन सवालों का जवाब 'नहीं' है तो राकेश जायसवाल की भूमिका केवल अध्यक्ष के पति तक सीमित होनी चाहिए न कि स्वयंभू अध्यक्ष की। यही वजह है कि नगर पालिका के कामकाज में राकेश की भूमिका को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे है जो निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट होगा। 

🔴 सरकारी धन से काम, फिर श्रेय किसका? 

बतादे कि नगर पालिका द्वारा कराए जाने वाले निर्माण कार्य जनता के पैसे से होते हैं। सड़क, नाली,इंटरलॉकिंग, प्रकाश व्यवस्था, पार्क अथवा अन्य विकास कार्य किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है।ऐसे में यदि किसी सार्वजनिक कार्य को लेकर यह धारणा बनाई जा रही है कि यह काम राकेश जायसवाल ने कराया, तो यह भी सवाल खड़ा होता है कि सरकारी संस्था के काम का व्यक्तिगत श्रेय किस आधार पर लिया जा रहा है? नगर पालिका का काम नगर पालिका का है। पैसा जनता का है। निर्णय निर्धारित प्रक्रिया का है। फिर किसी व्यक्ति विशेष के नाम से विकास कार्यों की पहचान क्यों ?

🔴अब जांच के बाद होगी तस्वीर साफ 

नगरवासियों का कहना है कि नगर पालिका कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज, बोर्ड बैठकों की कार्यवाही, उपस्थिति रजिस्टर, नोटशीट, विकास कार्यों की फाइलें और अधिकारियों कर्मचारियों के बयान की जांच करा ली जाए तो काफी कुछ स्वतः स्पष्ट हो सकता है। इसके अलावा कब-कब अध्यक्ष नगर पालिका कार्यालय पहुंचीं? कौन-कौन सी बैठकों में अध्यक्ष मौजूद रहीं? किन बैठकों में उनके पति राकेश मौजूद रहे?क्या किसी बैठक में राकेश जायसवाल ने अध्यक्ष की ओर से कोई भूमिका निभाई? क्या अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके स्तर से कोई निर्देश दिए गए ? इन तमाम सवालों का जवाब रिकॉर्ड से मिल सकता है।

🔴अब नगर पालिका प्रशासन की परीक्षा

यह मामला किसी व्यक्ति के निजी जीवन में दखल का नहीं, बल्कि सरकारी संस्था में अधिकार और जवाबदेही की सीमा का है। राकेश जायसवाल अध्यक्ष के पति हैं, इसमें कोई विवाद नहीं। विवाद का सवाल यह है कि क्या अध्यक्ष के पति होने मात्र से उन्हें नगर पालिका के प्रशासनिक कामकाज में कोई अधिकार प्राप्त हो सकता है?यदि नहीं, तो नगर पालिका प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि उनके नाम और भूमिका को लेकर चल रही चर्चाओं में कितनी सच्चाई है और यदि उन्हें किसी प्रकार की आधिकारिक जिम्मेदारी दी गई है तो उसका आदेश सार्वजनिक करना चाहिए। क्योंकि सवाल सीधा है जनता ने अध्यक्ष किरन जायसवाल को चुना है या फिर 'अध्यक्ष पति' राकेश जायसवाल को? अब इस सवाल का जवाब चर्चा नहीं, दस्तावेज और जांच से स्पष्ट होगा।

नोट - अगले अंक मे पढे... '' किस सासंद के प्रतिनिधि है राकेश जायसवाल, ईओ नगरपालिका का कहना है सासंद प्रतिनिधि है राकेश

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

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