जिसने खोली कनोडिया इंटर कॉलेज की पोल, उसी के नाम से डीएम को ‘फर्जी शिकायत’, कनोडिया इंटर कॉलेज में किसने रचा ‘फर्जी शिकायत’ का खेल? पत्रकार के नाम और फर्जी हस्ताक्षर कर दिया डीएम को पत्र
🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर। जनपद के कप्तानगंज स्थित कनोडिया इंटरमीडिएट कालेज में दो वर्ष बिना कार्य किये लाखो रुपये वेतन प्राप्त करने, कूटरचित व तथ्य गोपन कर नियम विरुद्ध तरीके से विनियमितकरण व चयन वेतनमान का लाभ लेने वाले सहायक अध्यापक श्याम नरायण पाण्डेय व वीरेंद्र पाण्डेय की धोखाधड़ी की एक और कारस्तानी सामने आयी है। कहना ना होगा कि श्याम नरायण पाण्डेय व वीरेंद्र पाण्डेय ने पत्रकार संजय चाणक्य का फर्जी हस्ताक्षर कर अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य जितेन्द्र तिवारी व सहायक अध्यापक अरुण कुमार मिश्रा के खिलाफ जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर शिकायत की है, ऐसा सूत्रो कि दावा है। जब इसकी जानकारी पत्रकार संजय चाणक्य को हुई तो उन्होंने कलेक्ट्रेट में लगे सीसीटीवी कैमरा व शिकायती पत्र की निष्पक्ष जांच कराकर उनका फर्जी हस्ताक्षर कर शिकायत करने वाले शिक्षको के विरुद्ध विधिक कार्रवाई करने की मांग की है। यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि श्याम नरायण व वीरेंद्र पाण्डेय द्वारा जिस शिकायत को संजय चाणक्य के बिना जानकारी मे फर्जी हस्ताक्षर कर जिलाधिकारी को दिया गया उसमें कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रधानाचार्य जितेन्द्र तिवारी और सहायक अध्यापक अरुण कुमार मिश्र पर वित्तीय वर्ष 2025-26 का आयकर जमा न करने तथा राजस्व क्षति पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए हैं। शिकायत के अंत में संजय चाणक्य का नाम, पद और फर्जी हस्ताक्षर अंकित हैं। संजय चाणक्य का दावा है कि हस्ताक्षर उनके नहीं हैं और उन्होंने कोई शिकायत जिलाधिकारी को नहीं दी।
🔴जिस प्रकरण को उठाया, उसी में ‘फर्जी शिकायत’ का आरोप
दरअसल, कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज में सहायक अध्यापक देवेन्द्र पाण्डेय की कथित शैक्षिक डिग्री, सेवा संबंधी प्रकरण तथा सहायक अध्यापक श्याम नारायण पाण्डेय और वीरेंद्र पाण्डेय से जुड़े वित्तीय लाभ और एरियर के मामलों को लेकर युगान्धर टाइम्स एंव लखनऊ से प्रकाशित तमाम समाचारपत्रो ने लगातार प्रमुखता से खबर प्रकाशित किए है। आरोपों के मुताबिक श्याम नारायण पाण्डेय और वीरेंद्र पाण्डेय ने दो वर्ष बिना कार्य किए एरियर के रुप मे लाखो रुपये प्राप्त किया तथा नियम विरुद्ध फर्जी तरीके से विनियमितीकरण और चयन वेतनमान से संबंधित लाभ हासिल किए है। इन आरोपों की खबरें प्रकाशित होने के बाद मामला विभागीय स्तर तक पहुंचा। बताया जाता है कि जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की ओर से विद्यालय के प्रधानाचार्य जितेन्द्र तिवारी से संबंधित मूल रजिस्टर और दस्तावेजों के साथ आख्या मांगी गई थी। सूत्रों का दावा है कि प्रधानाचार्य ने उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर विभाग को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इससे खार खाकर श्याम नरायण पाण्डेय व वीरेंद्र पाण्डेय ने संजय चाणक्य का फर्जी हस्ताक्षर बनाकर अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य व सहायक अध्यापक के विरुद्ध खौफनाक कुचक्र रच डाला।
🔴रिपोर्ट से खफा होकर जांच भटकाने की साजिश?
सूत्रों के अनुसार, प्रधानाचार्य द्वारा दी गई रिपोर्ट से नाराज हुए सहायक अध्यापक श्याम नारायण पाण्डेय और वीरेंद्र पाण्डेय ने संजय चाणक्य के नाम का इस्तेमाल कर जिलाधिकारी को एक शिकायत भेजी। हालांकि, यह आरोप अभी सूत्रों के हवाले से है और इसकी पुष्टि होना बाकी है।संजय चाणक्य का कहना है कि उन्होंने न तो ऐसी कोई शिकायत की है और न ही इस तरह के शिकायत पत्र पर कोई हस्ताक्षर किया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिकायत पत्र पर उनका नाम और कथित हस्ताक्षर किसने किए ?
🔴सवाल शिकायत पर नहीं शिकायतकर्ता की पहचान पर
मामले में अब जांच सिर्फ इस बात की नहीं रह गई है कि विद्यालय में आयकर जमा हुआ या नहीं। उससे बड़ा सवाल यह है कि किसी पत्रकार के नाम और हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर कथित फर्जी शिकायत तैयार करने की कोशिश किसने की और क्यों की? पत्रकार संजय चाणक्य का दावा सही है तो यह महज एक शिकायत का मामला नहीं, बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति के नाम और हस्ताक्षर के कथित दुरुपयोग का गंभीर व अपराधिक मामला है। ऐसे में शिकायत पत्र की मूल प्रति, उसे कार्यालय में प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति, पत्र के प्राप्ति अभिलेख और हस्ताक्षर की सत्यता की जांच महत्वपूर्ण है।
🔴हस्ताक्षर’ की जांच खोलेगी राज!
विधि विशेषज्ञों का कहना है कि मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिकायत पत्र पर दर्ज हस्ताक्षर है। संजय चाणक्य हस्ताक्षर से इनकार कर रहे हैं तो प्रशासन के सामने इसका सत्यापन कराना कोई कठिन काम नहीं है।शिकायत पत्र की मूल प्रति सुरक्षित रखी जाए। उसे किसने जमा किया, यह पता किया जाए। कार्यालय की प्राप्ति प्रक्रिया और उपलब्ध अभिलेखों की जांच हो और जरूरत पड़े तो हस्ताक्षर का विशेषज्ञ परीक्षण कराया जाए। दुध का दूध पानी का पानी साफ हो जायेगा।
🔴फ्लैश बैक
बतादे कि शिक्षक श्याम नारायण पाण्डेय, वीरेन्द्र पाण्डेय और बर्खास्तगी के बाद भी कथित रूप से तथ्य छिपाकर नौकरी कर रहे देवेन्द्र पाण्डेय जुलाई 2012 से जून 2014 तक करीब दो वर्षों तक विद्यालय में बिना कार्य किए लाखों रुपये एरियर के रूप में निकाल लिए है।सबसे बड़ा खुलासा यह कि मूल उपस्थिति पंजिका में इन शिक्षको के हस्ताक्षर तक नहीं है। यानी स्कूल गए नहीं, पढ़ाया नहीं, लेकिन सरकारी खजाने से एरियर के रुप वेतन निकल लिया गया। जानकर कहते है यह कोई छोटी लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी धन पर योजनाबद्ध डकैती जैसा मामला है।
🔴2018 में नौकरी पक्की, लेकिन 2008 से ही उठा लिया चयन वेतनमान!
खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। जिन शिक्षकों का विनियमितीकरण वर्ष 2018 में हुआ, उन्होंने चयन वेतनमान का लाभ वर्ष 2008 से ही लेना शुरू कर दिया। यानी पात्रता से बीस साल पहले सरकारी सुविधा का लाभ।अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह चमत्कार कैसे हुआ? किस अधिकारी ने आंख बंद कर फाइलों पर हस्ताक्षर किए? और किसके संरक्षण में सरकारी धन को इस तरह लुटाया गया? सूत्र बताते हैं कि फर्जी दस्तावेजों और कूटरचित अभिलेखों के सहारे पूरा खेल खेला गया। लेकिन विभागीय अफसर ऐसे चुप बैठे है जैसे उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा हो।
🔴शिक्षा निदेशालय ने पकड़ी गड़बड़ी, फिर भी कार्रवाई नहीं
मामला तब खुला जब शिक्षा निदेशालय ने जांच में पाया कि संबंधित शिक्षकों की कार्यरता संदिग्ध है। निदेशक माध्यमिक शिक्षा के पत्र में साफ लिखा गया कि मूल उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर नहीं पाए गए, इसलिए कार्य प्रमाणित नहीं होता।स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत के अनुसार भुगतान नियमसंगत नहीं है।वित्त नियंत्रक ने भी चेतावनी दी है कि यदि अनियमित भुगतान हुआ तो संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षक और वित्त लेखाधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। बावजूद इसके न भुगतान रुका, न वसूली हुई और न किसी पर कार्रवाई।यानी शासन के आदेश फाइलों में पड़े रहे और सरकारी धन निकलता रहा।
🔴आईजीआरएस पर ‘सच का पोस्टमार्टम’!
सबसे सनसनीखेज आरोप तब सामने आया जब पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल आईजीआरएस पर की गई। जांच के लिए प्रधानाचार्य से रिपोर्ट मांगी गई। प्रधानाचार्य ने करीब 20 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी, जिसमें मूल उपस्थिति पंजिका,जांच रिपोर्ट,शिक्षा निदेशक के आदेश,वित्त नियंत्रक के पत्र,और फर्जी भुगतान से जुड़े तमाम साक्ष्य शामिल थे।लेकिन आरोप है कि डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्त ने उन दस्तावेजों को दबा दिया और आईजीआरएस पर मात्र एक पन्ने की ऐसी रिपोर्ट अपलोड कर दी, जिसमें पूरे मामले को हल्का दिखाने की कोशिश की गई।यानी जनता जिस पोर्टल को न्याय का माध्यम समझती है, वहां भी सच को दफनाने का खेल खेला गया।
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य


