🔴नियमों का पाठ पढ़ाने वाले जिम्मेदारोंके सामने से रोजाना गुजरती है दो दर्जन से अधिक बिना नंबर प्लेट की चार पहिया गाड़ियां
🔴 गांधी चौक पर हर वक्त तैनात रहते हैं ट्रैफिक और स्थानीय पुलिस के जिम्मेदार, फिर भी कुंभकर्णी नींद सो रहा पूरा प्रशासनिक तंत्र
🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर। जनपद में यातायात पुलिस की दोहरा चरित्र इन दिनो न सिर्फ बहस का मुद्दा बना हुआ है। बल्कि कानून के रखवालों की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सबब यह एक तरफ जहां सरकार और प्रशासन सड़क सुरक्षा तथा यातायात नियमों को सख्ती से लागू करने का दावा करते नही थक रही हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद सरकारी तंत्र नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ा रही हैं।
मामला कुशीनगर नगर पालिका परिषद से जुडा है। यहा नगर पालिका अध्यक्ष व ईओ की देखरेख में दो दर्जन से अधिक चार पहिया अवैध रूप से बिना नंबर प्लेट की शहर की सड़कों पर दनदना रही हैं। गंभीर बात यह है कि जनता के लिए कड़े नियम बनाने और मामूली चूक पर भारी-भरकम जुर्माना वसूलने वाली पुलिस और परिवहन विभाग की नजरों के सामने से यह अवैध गाड़ियां रोजाना गुजरती हैं, लेकिन मजाल है कि कोई इनका चालान काटने या अन्य कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा सके।
🔴 जिम्मेदारों के सामने बेखौफ उडया जा रहा नियमों का उल्लंघन
बेशक! शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने और नियमों का पालन करवाने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वह खुद अपने दोहरे चरित्र के साक्षी हैं। जगजाहिर है कि नगर पालिका की लगभग दो दर्जन से अधिक चार पहिया वाहन बिना किसी वैध नंबर प्लेट के शहर के प्रमुख मार्गों पर फर्राटा भर रही हैं। इन वाहनों का उपयोग मुख्य रूप से कूड़ा उठाने, उसकी ढुलाई करने, विभिन्न वार्डों में निर्माण सामग्री पहुंचाने और अन्य विभागीय कार्यों के लिए किया जा रहा है। मजे की बात यह है कि शहर के सबसे व्यस्त और प्रमुख केंद्र 'गांधी चौक' हमेशा पुलिस छावनी की तरह मुस्तैद रहता है। यहां हर वक्त ट्रैफिक पुलिस और स्थानीय थाने के जिम्मेदार अधिकारी व सिपाही तैनात रहते हैं। इसके अलावा परिवहन विभाग की टीमें भी समय-समय पर चेकिंग अभियान का दावा करती हैं। गोरखपुर, देवरिया, सपहा और पडरौना की तरफ जाने वाले हर छोटे-बड़े वाहन को इसी चौराहे होकर से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद, जब नगर पालिका की नंबर विहीन वाहने इन चौराहों से गुजरती हैं, तो तैनात सुरक्षाकर्मी मुंह फेर लेते हैं या फिर धृतराष्ट्र बन जाते हैं। नियम विरुद्ध इन वाहनों को रोकने, सीज करने या मोटर व्हीकल एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई करने की जहमत कोई नहीं उठाता है। जिम्मेदारो की इस करतूत से स्पष्ट होता है कि उनके के नाक के नीचे कानून का किस तरह मखौल उड़ाया जा रहा है। ऐसे मे सवाल यह है कि आम नागरिकों पर इतनी मेहरबानी क्यो नही दिखाई जाती है? बताया जाता है आम लोग के बाइक या कार पर हाई-सिक्योरिटी नंबर प्लेट या सामान्य नंबर प्लेट नही रहने पर यही जिम्मेदार रोककर तत्काल हजारों रुपये का चालान थमा देते है, जबकि सरकारी वाहन इस कानूनी बाध्यता से पूरी तरह परे नजर रहते हैं? क्या सरकारी विभागों और उनके वाहनों के लिए देश का मोटर व्हीकल एक्ट लागू नहीं होता? अधिकारियों की इस खामोशी और निष्क्रियता से यह साफ जाहिर होता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
🔴 ईओ को है अवैध संचालन की पूरी जानकारी
इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह कोई छुपा हुआ या अनजाना मामला नहीं है। नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी को इस अवैध संचालन की पूरी और पुख्ता जानकारी है। गाड़ियां रोजाना कार्यालय परिसर से निकलती हैं और वापस वहीं लौटती हैं, अधिकारियों की नजरों के सामने से गुजरती हैं, फिर भी आज तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने इन वाहनों को नियम के तहत चलने की कोई पहल नहीं की।
🔴 कानून की आंख पर सरकारी वाहन का पर्दा?
आम आदमी के लिए यातायात नियमों का मतलब चालान, जांच और कार्रवाई है। लेकिन सरकारी वाहन उसी नियम के दायरे में होने के बावजूद कार्रवाई से बाहर दिखाई दें तो व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। जानकारों का कहना है कि नंबर प्लेट वाहन की पहचान है। पहचान के बिना सड़क पर वाहन की मौजूदगी खुद कई सवाल खड़े करती है।कल को ऐसी गाड़ी दुर्घटना में शामिल हो जाए तो उसकी पहचान कैसे होगी? किसी विवाद में वाहन की भूमिका सामने आए तो उसका पता कैसे चलेगा? सीसीटीवी में वाहन कैद हो लेकिन नंबर न हो तो जांच किस आधार पर आगे बढ़ेगी?अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इस मामले में प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटती है , या फिर नगरपालिका की बिना नंबर प्लेट की दौड़ती यह गाड़ियां यूं ही तंत्र के मुंह पर तमाचा मारती रहेंगी।
🔴 एआरटीओ बोले—नियम विरुद्ध है
मामले में एआरटीओ दिलीप कुमार गुप्ता ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसा है तो यह नियम विरुद्ध है। प्रत्येक गाड़ी पर उसका पंजीयन चिन्ह लगाना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि कोई वाहन इस तरह संचालित हो रहा है तो यह जांच का विषय है और सड़क पर ऐसा वाहन पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी अब एआरटीओ के इस बयान के बाद असली सवाल कार्रवाई का है। क्या नगर पालिका की इन गाड़ियों की जांच होगी?क्या सभी वाहनों का पंजीयन और नंबर प्लेट सत्यापित होगा?क्या नियम विरुद्ध संचालन पाए जाने पर जिम्मेदारी तय होगी? क्योंकि अब मामला सिर्फ यह नहीं कि “गाड़ी पर नंबर प्लेट क्यों नहीं है? ” मामला यह है कि “नंबर प्लेट नहीं होने के बावजूद गाड़ी सड़क पर कैसे है?” सवाल यह है कि जब कानून के पहरेदार रोज सामने से गुजरती गाड़ियों को देख रहे थे, तब कानून की नजर आखिर कहां थी?
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य



