सुभाष को रिलीव करने में क्यों कांप रहे हाथ? शिक्षकों से कथित वसूली की चर्चा ने बढ़ाए सवाल!


🔴 शिक्षकों से वसूली की चर्चा, सुभाष पर डीआईओएस की मेहरबानी!

🔴सुभाष को रोकने के लिए डीआईओएस ने सीडीओ को किया गुमराह

🔴शिक्षकों से वसूली के आरोप, सुभाष पर ‘कृपा’ बरकरार!

🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर।शासन ने सुभाष प्रसाद यादव को बलिया भेज दिया है, लेकिन कुशीनगर के जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय से सुभाष की विदाई अब तक नहीं हो सकी है। वजह अत्यंत हास्यास्पद बताई गई कि उनके जगह दूसरा बाबू नहीं आया है। सीडीओ के सामने डीआईओएस ने  यही दलील रखी है, जबकि सुभाष यादव डीआईओएस दफ्तर में उस पर कार्यरत है जो पद वहा सृजित ही नही है।

 विभागीय सूत्रों का दावा है कि सुभाष को कार्यमुक्त न करने के पीछे आयोग से आए शिक्षकों के विद्यालय आवंटन के नाम पर कथित वसूली है। चर्चा है कि प्रत्येक शिक्षको से 50 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं और इसमें सुभाष यादव का नाम भी लिया जा रहा है। दावा सही है या गलत, यह जांच से तय होगा, लेकिन सवाल दिलचस्प है कि जिस कर्मचारी का तबादला हो चुका, उसे कार्यमुक्त करने में इतनी हिचकिचाहट क्यों?

🔴 एक की रवानगी, दूसरे को रोकने की वजह चर्चाओं में

कहना ना होगा कि एक ही कार्यालय के दो लिपिकों का स्थानांतरण हुआ। रमेश तिवारी को महराजगंज भेजा गया और उन्हें तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया जबकि सुभाष यादव को बलिया स्थानांतरित किया गया है, लेकिन उनकी रवानगी पर डीआईओएस का मनमाना ब्रेक लग गया है। डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्ता ने सीडीओ को बताया कि सुभाष के स्थान पर दूसरा बाबू नहीं आया है और उन्हें रिलीव करने से कार्यालय का काम प्रभावित होगा जबकि सच्चाई यह है कि सुभाष यादव डीआईओएस दफ्तर में बिना पद के कार्यरत रहे है। मतलब यह कि जिस पद पर सुभाष है वह पद डीआईओएस आफिस में सृजित ही नही है। ऐसे मे सुभाष के स्थान पर दूसरे बाबू के आने का कोई सवाल ही नहीं है। इतना ही नही

यहां सवाल सिर्फ स्थानांतरण आदेश का नहीं, बल्कि उस दलील का भी है जिसके आधार पर एक कर्मचारी को रोककर रखा गया है। क्या कार्यालय की कार्यप्रणाली किसी ऐसे कर्मचारी पर निर्भर है,जिसकी तैनाती ही कथित तौर पर स्वीकृत पद पर नहीं है? पद सृजित नहीं, फिर किस पद पर दूसरे बाबू का इंतजार?बिना पद के तैनाती का आरोप और पद खाली होने की दलील, दोनों एक साथ कैसे सही हो सकते हैं? इसका जवाब सेवा पुस्तिका, स्वीकृत पदों की सूची और तैनाती आदेश से ही मिल सकता है।

🔴 डेढ़ सौ शिक्षकों के आवंटन में 50 हजार की वसूली बना चर्चा

विभागीय सूत्रों के मुताबिक, आयोग से चयनित करीब डेढ़ सौ शिक्षकों को जनपद के विभिन्न विद्यालयों में ज्वाइन करने के लिए भेजा गया है। आरोप है कि विद्यालय आवंटन के नाम पर प्रत्येक शिक्षको से 50 हजार रुपये तक की वसूली की चर्चा है। इस कथित वसूली में सुभाष यादव का नाम भी सामने आ रहा है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह जांच का विषय है।

🔴 सीडीओ को डीआईओएस ने किया गुमराह 

इस संबंध मे जब सीडीओ से वार्ता की गई तो उन्होने कहा कि डीआईओएस ने सुभाष यादव को कार्यमुक्त न करने की वजह दूसरे बाबू का नहीं आना बताया है। दूसरी ओर, सूत्रों का दावा है कि सुभाष को शिक्षकों के विद्यालय आवंटन से जुड़ी कथित वसूली के कारण रोका गया है।इन दोनों बातों में से वास्तविक स्थिति क्या है, यह जांच के बिना तय नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि सुभाष यादव का पद ही स्वीकृत नहीं है, तो सीडीओ को दी गई दलील का आधार क्या था? क्या उन्हें कार्यालय की वास्तविक पद-स्थिति बताई गई थी?सीडीओ को गुमराह किए जाने का आरोप गंभीर है। इसकी पुष्टि विभागीय रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के जवाब से ही हो सकती है।

🔴परिचारक की नियुक्ति से पदोन्नति तक जांच की जरूरी

सुभाष यादव की नियुक्ति के संबंध में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, साढे तीन दशक पूर्व उनकी नियुक्ति अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में कसया विकासखंड के परिचारक पद पर हुई थी। बताया जाता है कि वह 16 अप्रैल 2001 तक इस पद पर कार्यरत रहे। परियोजना समाप्त होने के बाद उनकी सेवा किस आदेश से जारी रही और बाद में कनिष्ठ लिपिक के पद से पदोन्नति किस नियम के तहत हुई इन सवालों का जवाब भी विभागीय अभिलेखों से मिलना ही संभव है। जानकारों का कहना है कि नियुक्ति पत्र, सेवा पुस्तिका, पदोन्नति आदेश, पद स्वीकृति और सेवा निरंतरता से जुड़े दस्तावेजों की जांच से ही यह स्पष्ट होगा कि उनकी सेवा नियमसम्मत रही या नहीं।मामले में यह  स्पष्ट करना जरूरी है कि सुभाष यादव को शासन के स्थानांतरण आदेश के बावजूद कार्यमुक्त क्यों नहीं किया गया, उनकी वर्तमान तैनाती किस स्वीकृत पद पर है। यदि पद स्वीकृत नहीं है तो तैनाती और वेतन भुगतान की वैधता की जांच होनी चाहिए।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

Post a Comment

Previous Post Next Post