यूजीसी कानून शिक्षा सुधार का मुखौटा बनकर सामान्य जाति को हाशिये पर धकेलने की नीति का औज़ार बन चुका है, जहाँ मेरिट को कमज़ोर कर ‘जनरल’ होना अयोग्यता जैसा ठप्पा बना दिया गया है। फीस की मार और जटिल प्रक्रियाएँ मध्यमवर्गीय छात्र को चुपचाप बाहर करती हैं, जबकि ईडब्ल्यूएस काग़ज़ों में राहत बनकर ज़मीनी हकीकत में भ्रम साबित होती है। स्थायी नौकरियाँ सिमटती हैं, संविदा बढ़ती है और योग्य उम्मीदवार वर्षों इंतज़ार की सज़ा पाता है। डिजिटल मॉडल शहरों के अनुकूल और गाँवों के लिए बहिष्कार बनता है। संवाद की जगह फरमान और सुधार के नाम पर नियंत्रण थोप दिया गया है। शिक्षा बाज़ार बनती है और सामाजिक संतुलन टूटता है। यह नीति समान अवसर नहीं, चयनित संरक्षण रचती है। परिणामस्वरूप सामान्य जाति सबसे ज़्यादा भुगतान करने वाला और सबसे कम लाभ पाने वाला वर्ग बनता जा रहा है। इसलिए यूजीसी कानून अब शिक्षा का नहीं, सम्मान, अधिकार और भविष्य का निर्णायक सवाल बन चुका है।”
🔵संजय चाणक्य
यूजीसी अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नहीं रहा, बल्कि मोदी की नीतिगत हठधर्मिता के कारण आने वाले समय मे अपराधी बनाने का फैक्ट्री तैयार करने की योजना है। यही वजह है कि मोदी सत्ता की उल्टी गिनती शुरू होती दिखाई दे रही है। इतिहास साक्षी है जिस सरकार ने शिक्षा को दबाने की कोशिश की, उसी ने अपने पतन की नींव खुद रखी। आज यूजीसी कानून उसी पतन की सबसे स्पष्ट चेतावनी बन गया है।
मोदी सरकार ने शिक्षा को सुधार का विषय नहीं, बल्कि सर्वण समाज के युवको को हथियार बना दिया है। यूजीसी के नाम पर ऐसे आदेश थोपे जा रहे हैं, जिनका मकसद गुणवत्ता बढ़ाना नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की रीढ़ तोड़ना है। स्वायत्तता को काग़ज़ों में दफन किया जा रहा है, अकादमिक स्वतंत्रता को संदिग्ध बना दिया गया है और सोचने-समझने की परंपरा को “वोटबैंक” के नाम पर कुचला जा रहा है। सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है और यही से लोकतंत्र के अंत की शुरुआत होती है। सवर्ण छात्र इस सियासी प्रयोगशाला के सबसे बड़े शिकार हैं। फीस का बोझ बढ़ाया जा रहा है, प्रवेश प्रक्रियाओं को जानबूझकर जटिल बनाया जा रहा है और संसाधनों की कमी को डिजिटल इंडिया के खोखले नारों से ढका जा रहा है। जिनके पास इंटरनेट नहीं, लैपटॉप नहीं, स्थिर बिजली नहीं उनके लिए यह शिक्षा नहीं, निष्कासन है। मोदी सरकार किस भारत की बात करती है, उस भारत की, जो पढ़ सके, या उस भारत की, जो चुप रहे?
शिक्षकों की दुर्दशा इस व्यवस्था का कड़वा सच है। स्थायी नियुक्तियाँ लगभग समाप्त, अतिथि शिक्षकों का खुला शोषण, शोध और नवाचार के लिए धन का अकाल, जो शिक्षक सच बोले, उसे दबाने की कोशिश; जो असहमति रखे, उसे शक की नज़र से देखा जाए। सत्ता जब तर्क से डरने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि उसकी वैचारिक बुनियाद दरक चुकी है। यूजीसी के हर नए आदेश में यही डर साफ झलकता है।
मोदी सरकार हर विरोध पर एक ही जुमला उछाल देती है “रिफॉर्म।” लेकिन यह रिफॉर्म नहीं, रिमोट कंट्रोल है। यह संवाद नहीं, फरमान है। न छात्रों से चर्चा, न शिक्षकों से विमर्श, न राज्यों की सहमति बस दिल्ली से आदेश और नीचे सिर झुकाने की अपेक्षा। यही केंद्रीकरण, यही अहंकार सत्ता की उल्टी गिनती तय करता है।यूजीसी के खिलाफ उठता विरोध किसी एक नियम या अधिसूचना तक सीमित नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ विद्रोह है, जो शिक्षा को आज़ादी नहीं, गुलामी सिखाना चाहती है,जो समान्य जाति के छात्रो को अपराधी बनाने या फिर आत्महत्या करने पर मजबूर करे और सर्वण समाज गूंगा व सूरदास बनकर सहता रहे। यही वजह है कि आज यूजीसी एक संक्षिप्त रूप नहीं, एक संकेत बन चुका है, यूजीसी मतलब मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू।क्योंकि जब छात्र और शिक्षक एक साथ खड़े होते हैं, तो सत्ता के सबसे ऊँचे नारे भी रेत की तरह भरभरा कर गिर जाते हैं।



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