🔴इसका उद्देश्य कथित रूप से उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता आधारित भेदभाव को खत्म करना और समानता को बढ़ावा देना है। सतह पर यह एक प्रगतिशील कदम लगता है, खासकर रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे दुखद मामलों के बाद, जहां दलित छात्रों ने संस्थागत उत्पीड़न का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर ली थी। लेकिन गहराई में उतरें तो यह रेगुलेशन न केवल संतुलनहीन है, बल्कि समाज में जातिगत खाइयों को और गहरा करने वाला, दुरुपयोग का दरवाजा खोलने वाला और कैंपस जीवन को निगरानी का जाल बनाने वाला साबित हो सकता है।
🔵बृजबिहारी त्रिपाठी
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय जुड़ गया है। 13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026' अधिसूचित कर दिया। इसका उद्देश्य कथित रूप से उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता आधारित भेदभाव को खत्म करना और समानता को बढ़ावा देना है। सतह पर यह एक प्रगतिशील कदम लगता है, खासकर रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे दुखद मामलों के बाद, जहां दलित छात्रों ने संस्थागत उत्पीड़न का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर ली थी। लेकिन गहराई में उतरें तो यह रेगुलेशन न केवल संतुलनहीन है, बल्कि समाज में जातिगत खाइयों को और गहरा करने वाला, दुरुपयोग का दरवाजा खोलने वाला और कैंपस जीवन को निगरानी का जाल बनाने वाला साबित हो सकता है।
सबसे पहले रेगुलेशन की संरचना पर नजर डालें। हर उच्च शिक्षण संस्थान में अनिवार्य रूप से इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (ईओसी) और इक्विटी कमिटी बनानी होगी। इस कमिटी में एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के पुरुषों या सामान्य वर्ग के किसी भी प्रतिनिधि की कोई अनिवार्यता नहीं है। यह एकतरफा संरचना है, जो यह धारणा देती है कि केवल कुछ खास समूह ही निष्पक्ष हो सकते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के लोग स्वाभाविक रूप से पक्षपाती हैं। क्या यह संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन नहीं है? क्या यह 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' नहीं है, जहां एक वर्ग को दोषी मानकर शुरू किया जाता है?
भेदभाव की परिभाषा भी इतनी व्यापक और अस्पष्ट है कि कोई भी सामान्य बातचीत, मूल्यांकन या अनुशासनात्मक कार्रवाई को जातिगत भेदभाव का रूप दिया जा सकता है। रेगुलेशन में 'इंडायरेक्ट डिस्क्रिमिनेशन' या 'परसेप्शन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो व्यक्तिपरक हैं। अगर कोई छात्र या कर्मचारी महसूस करता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो जांच शुरू हो जाएगी—बिना ठोस सबूत के भी। शिकायत ऑनलाइन, लिखित, ईमेल या 24 घंटे हेल्पलाइन के जरिए की जा सकती है, और गोपनीयता की गारंटी है। लेकिन झूठी या बदले की भावना से की गई शिकायत पर कोई सजा या डिटरेंट नहीं है। ड्राफ्ट में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था, लेकिन फाइनल वर्जन में इसे हटा दिया गया। इसका मतलब है कि शिकायतकर्ता को कोई जोखिम नहीं, जबकि आरोपी (ज्यादातर मामलों में सामान्य वर्ग का) का करियर, प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य दांव पर लग जाता है। यह स्थिति एससी/एसटी एक्ट की याद दिलाती है, जहां भी झूठी शिकायतों का दुरुपयोग एक बड़ी समस्या रहा है। लेकिन यहां तो कैंपस जैसा छोटा और संवेदनशील माहौल है, जहां छात्र-शिक्षक के बीच पहले से ही दबाव होता है। अब 'इक्विटी स्क्वॉड्स' और 'इक्विटी एम्बेसडर्स' हर विभाग में होंगे, जो निरंतर निगरानी करेंगे। क्या यह कैंपस को पुलिस स्टेशन में बदल देगा? क्या छात्र अब खुलकर बहस करेंगे, मजाक करेंगे या दोस्ती निभाएंगे, जब हर बात पर 'जातिगत' लेबल लग सकता है? यह 'सर्विलांस कल्चर' पैदा करेगा, जहां लोग एक-दूसरे पर शक करेंगे, रिपोर्ट करेंगे और बदला लेंगे। परिणामस्वरूप जातिगत पहचान और मजबूत होगी, न कि कम। समाज में जो दूरियां पहले से मौजूद हैं, वे कैंपस से शुरू होकर बाहर फैलेंगी—क्योंकि यूनिवर्सिटी समाज का आईना होती है।
अपराध बढ़ने की आशंका भी कम नहीं है। जब शिकायत पर तुरंत कार्रवाई होती है (15 दिनों में रिपोर्ट, 7 दिनों में एक्शन), और संस्थान पर दंड का डर है (डिग्री प्रोग्राम बंद करना, फंडिंग रोकना, यूजीसी लिस्ट से हटाना), तो संस्थान रक्षात्मक हो जाएंगे। शिक्षक ग्रेडिंग, प्रवेश या मूल्यांकन में सतर्क हो जाएंगे—न कि मेरिट के आधार पर, बल्कि 'सुरक्षा' के नाम पर। इससे मेरिटोक्रेसी खत्म होगी। जनरल कैटेगरी के छात्रों को लगेगा कि उन्हें पहले से ही दोषी माना जा रहा है, जबकि आरक्षित वर्ग के छात्रों में 'पावर' का एहसास बढ़ेगा। यह नफरत पैदा करेगा, न कि सद्भाव। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स और चेंज.ऑर्ग पेटिशन में हजारों लोग इसे 'जनरल कैटेगरी के खिलाफ युद्ध' बता रहे हैं। राजस्थान में राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ और वैश्य संगठन एकजुट होकर इसका विरोध कर रहे हैं।यह रेगुलेशन पश्चिमी 'डीईआई' (डाइवर्सिटी, इक्विटी, इन्क्लूजन) मॉडल की नकल लगता है, जिसे अब अमेरिका और यूरोप में असफल मानकर पीछे हट रहे हैं। वहां भी 'इक्विटी' के नाम पर मेरिट कुर्बान हुई, फ्री स्पीच दबाई गई और समाज में विभाजन बढ़ा। भारत में, जहां जाति पहले से ही राजनीति और समाज का आधार है, ऐसे नियम और खतरनाक साबित होंगे। यूजीसी का दावा है कि शिकायतें 118% बढ़ी हैं (2019-20 में 173 से 2023-24 में 378), लेकिन इसका समाधान निगरानी और दंड से नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद और सांस्कृतिक बदलाव से होना चाहिए।
क्या यह नियम वाकई भेदभाव रोकेंगे? या जाति को और ज्यादा संस्थागत बनाकर समाज को बांटेंगे? क्या कैंपस अब ज्ञान का केंद्र बनेगा या शिकायतों का अड्डा? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट है कि 'इक्विटी' के नाम पर एक खतरनाक खेल शुरू हो गया है, जो दूरियां कम करने के बजाय बढ़ाएगा, अपराध को बढ़ावा देगा और दुरुपयोग का रास्ता साफ करेगा। सरकार और यूजीसी को चाहिए कि इसे वापस लें या कम से कम झूठी शिकायतों पर सख्त प्रावधान जोड़ें, कमिटी में सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें और अस्पष्ट परिभाषाओं को स्पष्ट करें। अन्यथा, उच्च शिक्षा का सपना समानता का नहीं, विभाजन का बन जाएगा।
(लेखक: पत्रकार व सामाजिक चिंतक है।)



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