🔴आदेश दोनों पर, कार्रवाई एक पर, डीआईओएस ने खेला सुनियोजित खेल
🔴 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर। पडरौना में गोस्वामी तुलसी दास इंटर कॉलेज के 700 पत्राचार परीक्षार्थियों को परीक्षा से वंचित करने के गंभीर मामले में एक तरफा कार्रवाई ने नया बखेडा खडा कर चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।प्रधान लिपिक पर मुकदमा दर्ज कर निलंबन की कार्रवाई कर दी गई है, वही दुसरी ओर नोडल अधिकारी पर ठोस कदम अब तक लंबित हैं जबकि निदेशालय द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक को दिये आदेश में नोडल अधिकारी व प्रधान लिपिक दोनो के खिलाफ उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम-2024 की धाराओं में अभियोग पंजीकृत कराने का उल्लेख किया गया है। डीआईओएस के इस कार्रवाई के पीछे खुद को और दोषियों को बचाने की बात कही जा रही है। वजह यह है कि इस पूरे प्रकरण में डीआईओएस दफ्तर की जबाबदेही नोडल अधिकारी व प्रधान लिपिक से अधिक है। यही वजह है कि पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल डीआईओएस कार्यालय की भूमिका को लेकर उठ रहा है।
🔴आदेश दोनों पर, फिर कार्रवाई एक पर क्यो?
पत्राचार शिक्षा संस्थान, प्रयागराज उत्तर प्रदेश के अपर शिक्षा निदेशक सीएल चौरसिया द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक को जारी आदेश पत्र मे गोस्वामी तुलसीदास इंटर कालेज के नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी और प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम-2024 की सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कराए जाने का निर्देश स्पष्ट शब्दों मे दिया गया है।इसके बावजूद जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त ने प्रबंधक व प्रधानाचार्य के माध्यम से केवल प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराकर बिना नोटिस जारी किये निलंबन के कार्रवाई की संस्तुति कर दी जबकि नोडल अधिकारी पर अब तक कोई कार्रवाई नही हुई ?
🔴प्रक्रिया की परतें, डीआईओएस दफ्तर की भूमिका
विभाग से जुडे जानकारों की माने तो परीक्षा आवेदन पत्र अंतिम रूप से डीआईओएस कार्यालय के माध्यम से ही बोर्ड को भेजे जाते हैं। ऐसे मे 700 परीक्षार्थियों के फॉर्म अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण थे, तो तीन संभावनाएँ बनती हैं। पहला जांच हुई, लेकिन खामियां पकड़ी नहीं गईं। दुसरा जांच औपचारिक रही, गहन नहीं और तीसरा जांच हुई ही नहीं। बताया जाता है कि डीआईओएस कार्यालय के माध्यम से ही परीक्षा आवेदन पत्र बोर्ड तक जाते हैं। ऐसे में यदि 700 फॉर्म त्रुटिपूर्ण थे, तो क्या डीआईओएस दफ्तर में उनकी जांच नहीं हुई? अगर जांच हुई, तो गड़बड़ी पकड़ी क्यों नहीं गई?और यदि नहीं हुई, तो यह चूक किसकी मानी जाए?तीनों ही स्थितियाँ डीआईओएस दफ्तर की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न खडा करती हैं।आवेदन जब डीआईओएस दफ्तर से होकर बोर्ड तक गए, तो निगरानी और क्रॉस-चेक की जिम्मेदारी भी डीआईओएस दफ्तर की बनती है।प्रक्रिया के जानकार बताते हैं कि इतने बड़े पैमाने की त्रुटि आमतौर पर बहु-स्तरीय निगरानी की विफलता का संकेत होती है।
🔴निलंबन का खेल
विधि विशेषज्ञों ने बिना नोटिस निलंबन को लेकर कानूनी सवाल उठाते हुए कहा कि सेवा नियमावली के तहत सामान्यतः निलंबन से पूर्व कारण बताओ नोटिस व स्पष्टीकरण की प्रक्रिया अपनाई जाती है, खासकर जब मामला जांचाधीन हो। यदि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो न्यायालय से राहत मिलना संभव है। सूत्रो का कहना है कि इस गंभीर प्रकरण में डीआईओएस अपनी खुद की जबाबदेही से खुद को किनारा कसते हुए पहले नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी को बचाया फिर आरोपी दोषी प्रधान लिपिक को बिना नोटिस जारी किये, बिना स्पष्टीकरण लिए निलंबन की संस्तुति करके न्यायालय से राहत प्राप्त करने सुनियोजित खेल, खेला है।
🔴 क्या करना चाहिए था डीआईओएस को
विभाग से ताल्लुकात रखने वाले जानकारो की माने तो जिला विद्यालय निरीक्षक, पत्राचार शिक्षा संस्थान, उत्तर प्रदेश से जारी आदेश के अनुपालन मे अपर निदेशक के पत्र का हवाला देते हुए नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी व विद्यालय के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक के खिलाफ अपने पद से तहरीर देकर मुकदमा दर्ज कराते फिर प्रधान लिपिक के खिलाफ प्रबंधक से निलंबन का प्रस्ताव लेकर नोटिस जारी करते, स्पष्टीकरण लेते उसके बाद संतुष्टपूर्ण जबाब न मिलने की दशा मे निलंबन की संस्तुति करते। किन्तु डीआईओएस ने ऐसा न करके पहले खुद को इस प्रकरण से अलग किया फिर नोडल अधिकारी को बचाया उसके बाद प्रधान लिपिक को बचने का पुरा अवसर दिया है जबकि सात सौ छात्रो चौपट हुए भविष्य के जिम्मेदार यह तीनो है।
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य


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