योगी सरकार में सरकारी जमीन पर ‘लेखपालों का खेल’! करोड़ों की संपत्ति 12 लाख में बेचने का आरोप

🔵 पडरौना-सोहरौना सीमा पर बचत, बंजर और सिंचाई विभाग की जमीन पर कथित प्लॉटिंग, तीन लेखपालो की भूमिका संदिग्ध 

🔴करोड़ों की जमीन पर किसका कब्जा, किसके इशारे पर चल रहा प्लॉटिंग का खेल?

🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में भू-माफिया के खिलाफ कार्रवाई और सरकारी जमीनों को कब्जामुक्त कराने का दावा किया जा रहा है वही जिले के पडरौना तहसील क्षेत्र में सरकारी संपत्ति की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है।  पडरौना-सोहरौना सीमा व कसया-पडरौना मार्ग के किनारे स्थित बेशकीमती बचत, बंजर और सिंचाई विभाग से संबंधित जमीन की कथित पैमाइश कर उसे निजी लोगों के हाथो बेचने का सनसनीखेज मामला प्रकाश मे आया हैं। आरोपों के मुताबिक, करीब करोड़ों रुपये कीमत की जमीन का कथित सौदा महज 12 लाख रुपये में किया गया। सूत्रो की माने तो एक रसूखदार लेखपाल ने अपने दो सहयोगी लेखपालो के साथ सरकारी जमीन की पैमाइश कर प्लॉटधारकों को कब्जा दिलाया  है। 

बेशक! योगी सरकार में सरकारी जमीनों को अवैध कब्जा से मुक्त कराने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे मे किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा सरकारी भूमि को कथित प्लाटिंग कराने वाले लोगों के हाथो बेचने का मामला, कोई मामूली कब्जा का नही है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि  तहसील कार्यालय से महज तीन सौ मीटर कसया-पडरौना मार्ग पर पडरौना-सोहरौना सीमा के इस सरकारी जमीन को निजी लोगों व प्लाटरो के हवाले करने का आदेश किसने दिया? और यदि जमीन पर प्लॉटिंग हुई, तो जिम्मेदार राजस्वकर्मी अब तक जांच के दायरे में क्यों नहीं हैं?विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी जमीन को भू-माफियाओं से बचाने की जिम्मेदारी जिस राजस्व तंत्र पर है, उसी तंत्र के कर्मचारियों पर मोटी रकम लेकर सरकारी जमीन की बंदरबांट में भूमिका निभाने के आरोप, प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल है।

🔴अभिलेख खोलेंगे राज: सरकारी जमीन या निजी संपत्ति 

जानकारो का कहना है कि पडरौना-सोहरौना सीमा पर सड़क के किनारे स्थित जमीन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सबसे पहले उसके राजस्व अभिलेखों की जांच जरूरी है। आरोप है कि यहां बचत की भूमि के साथ बंजर और सिंचाई विभाग से संबंधित जमीन पर भी प्लॉटिंग की जा रही है। ऐसे में यह पता लगाना आवश्यक है कि संबंधित भूखंडों का राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज वर्गीकरण क्या है? और मौके पर उनका इस्तेमाल किस रूप में हो रहा है।यदि जमीन सरकारी खाते में दर्ज थी, तो उसे निजी व्यक्तियों को सौंपने के लिए किस सक्षम अधिकारी ने आदेश दिया? क्या भूमि की श्रेणी बदलने की कोई विधिक प्रक्रिया अपनाई गई? क्या सक्षम अधिकारियों से अनुमति ली गई थी? अथवा सिर्फ लेखपालो के पैमाइश और स्थानीय स्तर की कार्रवाई के आधार पर सरकारी जमीन पर निजी लोगों व प्लाटरो का कब्जा स्थापित करा दिया गया? इन सवालों का जवाब संबंधित जमीन की मूल खतौनी, खसरा, नक्शा, भूमि की श्रेणी, नामांतरण आदेश और अन्य राजस्व अभिलेखों से ही स्पष्ट होगा इस लिए इसकी जांच जरूरी है। यदि रिकॉर्ड में सरकारी जमीन दर्ज होने के बावजूद उस पर निजी कब्जा या प्लॉटिंग पाई जाती है, तो यह जांचना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि इस कृत्य को अंजाम देने वाले लेखपालो के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई है। 

🔴 पहले पैमाइश, फिर कब्जा! दो लेखपालों की भूमिका पर सवाल

इस प्रकरण का सबसे अहम पहलू जमीन की कथित पैमाइश और उसके बाद प्लॉटधारकों को सौंपे जाने का आरोप हैं। आरोप है कि रसूखदार लेखपाल के साथ दो अन्य लेखपालों ने पडरौना-सोहरौना सीमा पर स्थित जमीन की पैमाइश की और इसके बाद संबंधित भूखंडों को निजी व प्लाटरो के हाथो बारह लाख रुपये मे बेचकर कब्जा दिला दिया।अब सवाल यह है कि पैमाइश किसके आवेदन आदेश  पर हुई? क्या जमीन की श्रेणी और स्वामित्व की जांच की गई थी? क्या संबंधित विभाग के अधिकारियों को मौके पर बुलाया गया था? क्या पैमाइश की रिपोर्ट तैयार कर उच्चाधिकारियों को भेजी गई? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि, क्या किसी सक्षम अधिकारी का ऐसा आदेश था, जिसके आधार पर सरकारी जमीन किसी निजी व्यक्ति को सौंपी जा सकती थी?इसलिए यह जांचना जरूरी है कि कथित पैमाइश का इस्तेमाल कहीं सरकारी जमीन पर निजी कब्जे का रास्ता बनाने के लिए तो नहीं किया गया।यदि ऐसा हुआ है, तो केवल मौके पर मौजूद कर्मचारियों की भूमिका ही नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और संबंधित लाभार्थियों की जिम्मेदारी भी संदेह के घेरे में है।

🔴 12 लाख रुपये में करोड़ों की जमीन?

आरोप है कि सड़क किनारे तथा सिंचाई विभाग के नाले के दोनों तरफ स्थित बेशकीमती जमीन को महज 12 लाख रुपये में दूसरे व्यक्ति को सौंप दिया गया। स्थानीय स्तर पर इस जमीन की कीमत करोड़ों रुपये बताई जा रही है। हालांकि, कथित सौदे की वास्तविक रकम, जमीन का क्षेत्रफल और बाजार मूल्य आधिकारिक जांच से ही प्रमाणित होंगे।यदि सरकारी जमीन को निजी व्यक्ति के पक्ष में अवैध तरीके से हस्तांतरित या कब्जे में दिया गया है, तो मामला सरकारी संपत्ति को नुकसान, राजस्व अभिलेखों की वैधता और संबंधित कर्मचारियों की जवाबदेही जैसे सवाल भी जुड़ेंगे। प्रशासन को यह भी जांचना होगा कि कथित रूप से जमीन हासिल करने वाले व्यक्ति के पास कौन से दस्तावेज हैं, जमीन पर कब्जा किस आधार पर मिला।

🔴 सिंचाई विभाग की जमीन पर भी गिद्ध दृष्टि, नाले के किनारे प्लॉटिंग की जांच जरूरी

मामले में सिंचाई विभाग से संबंधित जमीन और नाले के दोनों तरफ स्थित भूखंडों को लेकर भी आरोप सामने आए हैं। यदि संबंधित जमीन वास्तव में विभागीय संपत्ति है, तो उसकी सीमा, स्वामित्व और वर्तमान उपयोग की अलग से जांच की जानी चाहिए। ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित जमीन सिंचाई विभाग के अभिलेखों में किस रूप में दर्ज है, क्या उसकी पैमाइश विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी में हुई और क्या किसी निजी व्यक्ति को वहां कब्जा या निर्माण करने की अनुमति दी गई थी।यदि विभागीय भूमि पर बिना वैधानिक अनुमति कब्जा या प्लॉटिंग की पुष्टि होती है, तो संबंधित विभाग और राजस्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनना स्वभाविक है।

🔴जीरो टॉलरेंस नीति की अग्नि परीक्षा

विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब नियमों का उल्लंघन करने वालों की जवाबदेही तय हो। पडरौना -सोहरौना सीमा अन्तर्गत सरकारी भूमि को लेखपालो द्वारा बेचने व कब्जा दिलाने का यह मामला प्रशासन के सामने यक्ष प्रश्न बना है। ऐसे मे सरकारी जमीन की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच कब होगी। विशेषज्ञों के कहा कि जिलाधिकारी को चाहिए कि संबंधित भूमि की पैमाइश राजस्व और सिंचाई विभाग के सक्षम अधिकारियों की संयुक्त टीम से कराये। जमीन की मूल खतौनी, खसरा, नक्शा, भूमि की श्रेणी, पैमाइश रिपोर्ट, कथित हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेज और मौके पर मौजूद कब्जे का सत्यापन कराकर  यह भी स्पष्ट किया जाए कि किस सक्षम अधिकारी के आदेश पर इस कृत्य को अंजाम दिया गय। हुआ था या नहीं।

नोट - अगले अंक मे पढे.. कौन है वे तीनो लेखपाल, होगा रसूखदार सहित तीनो लेखपालो के नाम का खुलासा...

रिपोर्ट - संजय चाणक्य



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