जांच पहुंची तो अधिकार की दुहाई, पालिका के भ्रष्टाचार पर कब होगी कार्रवाई?


🔴करोड़ों के विकास कार्य, सवालों में पालिका का हिसाब, जांच से पहले ‘अधिकार’ की ढाल, नगर पालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों का कौन देगा हिसाब ?नपाध्यक्ष और ईओ की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल

🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर में अगर सब कुछ नियमानुसार और पारदर्शी है तो फिर बीते दिनो एसडीएम के औचक निरीक्षण के बाद नपाध्यक्ष किरन जायसवाल बिलबिला क्यो उठी? उन्हें  नोटिस देने की इतनी जल्दी क्यों पड़ी? यह सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि नगर पालिका के विकास कार्यों, सरकारी धन के इस्तेमाल, कर्मचारियों की मनमानी और अधिशासी अधिकारी की कार्यशैली को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। शिकायतें लगातार प्रशासन तक पहुंच रही हैं, खबरें प्रकाशित हो रही हैं और इसी बीच जब प्रशासन ने नगर पालिका कार्यालय की ओर रुख किया तो जांच के सवालों का जवाब देने के बजाय नपाध्यक्ष ने निरीक्षण के अधिकार पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया।

यह पूरा घटनाक्रम अब नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। खासकर तब, जब नगर में विकास के नाम पर होने वाले कार्यों में कथित अनियमितता और धन के बंदरबांट को लेकर लगातार आवाज उठती रही है। सूत्रों का दावा है कि इन्हीं शिकायतों और नगर पालिका की कार्यशैली को लेकर मिल रही सूचनाओं को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम ने औचक निरीक्षण किया था।


🔴कामकाज पर उठे सवाल तो निरीक्षण से ‘अधिकार’ तक पहुंच गया मामला

नगर पालिका में  एसडीएम का निरीक्षण हुआ। कार्यालय के अभिलेख और पंजिकाएं देखी गईं। इसके बाद नपाध्यक्ष किरन जायसवाल की ओर से एसडीएम को नोटिस जारी कर दिया गया। नोटिस में निरीक्षण की वैधानिकता और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए गए। यहां सवाल यह नहीं कि एसडीएम को निरीक्षण का अधिकार है या नहीं, उसकी वैधानिक स्थिति अलग विषय है। सवाल यह है कि नगर पालिका के कामकाज पर उठ रही शिकायतों की जांच के दौरान पालिका नेतृत्व का रुख क्या होना चाहिए था? अगर विकास कार्यों में कोई गड़बड़ी नहीं है, सरकारी धन का एक-एक पैसा नियमानुसार खर्च हुआ है, कर्मचारियों की मनमानी नहीं है और ईओ की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी है तो फिर जांच से घबराने की वजह क्या है?

🔴जांच को जवाब दे, जांच करने वाले को नोटिस नहीं।

जानकारों का कहना है कि नगर पालिका अध्यक्ष का दायित्व केवल विकास कार्यों का उद्घाटन, शिलापट्ट और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। जनता के पैसे से चलने वाली संस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।ऐसे में नपाध्यक्ष पर सवाल उठना मुनासिब है कि नगर पालिका के विकास कार्यों को लेकर लगातार उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच की मांग क्यों नहीं की गई? यदि शिकायतें गलत हैं तो अभिलेख सामने रखकर उन्हें खारिज क्यों नहीं किया जाता? बजाय इसके कि निरीक्षण के अधिकार को लेकर अध्यक्ष द्वारा एसडीएम पर सवाल उठा जाए। मतलब साफ है कि पालिका के कामकाज की जांच से ज्यादा महत्वपूर्ण जांच करने वाले अधिकारी की अधिकारिता को मुद्दा बनाना है। ताकि नगर पालिका के विकास कार्यों में हुए भ्रष्टाचार की पोल सार्वजनिक न हो, और लूट-खसोट वैसे ही चलते रहे जैसे चल रहा है।

🔴ईओ की भूमिका भी सवालों के घेरे में

कहना ना होगा कि नगर पालिका की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिशासी अधिकारी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। विकास कार्यों की प्रक्रिया, अभिलेख, कार्यालयीय व्यवस्था और कर्मचारियों के प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े सवालों का जवाब भी ईओ से ही अपेक्षित होता है।इसके बावजूद नगर पालिका में कर्मचारियों की कथित मनमानी, कार्यालयीय अव्यवस्था और मुख्यमंत्री के महत्वाकांक्षी सम्पूर्ण समाधान दिवस में ईओ की अनुपस्थिति जैसे मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि नगर पालिका की प्रशासनिक कमान आखिर किस तरह चल रही है?यदि ईओ की मौजूदगी और निगरानी में व्यवस्था चल रही है तो कर्मचारियों की मनमानी की शिकायतें लगातार क्यों आ रही हैं? और यदि शिकायतें गलत हैं तो उनके खिलाफ तथ्यात्मक जवाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? 

🔴विकास के नाम पर खर्च हो रहा पैसा, लेकिन हिसाब मांगते ही सन्नाटा

नगर पालिका में सबसे बड़ा सवाल विकास कार्यों पर खर्च होने वाली रकम को लेकर है। सड़क, नाली, इंटरलॉकिंग, सौंदर्यीकरण और अन्य निर्माण कार्यों को लेकर समय -समय पर सवाल उठते रहे हैं। कहीं लागत को लेकर भ्रम है तो कहीं काम की गुणवत्ता पर सवाल। कहीं अभिलेखों को लेकर सवाल हैं तो कहीं कार्यप्रणाली को लेकर।जनता के पैसे से होने वाले कार्यो में टेंडर से लेकर भुगतान तक पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होना चाहिए। लेकिन जब शिकायतें उठती हैं और अधिकारी अभिलेख देखने पहुंचते हैं तो विवाद निरीक्षण के अधिकार तक पहुंच जाता है। यहीं से शक गहराता है क्या नगर पालिका में कागज इतने मजबूत हैं कि हर सवाल का जवाब दे सकें, या फिर कागज खुलने का डर ही असली बेचैनी है?


🔴 असली मुद्दे से ध्यान भटकाना 

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे विवाद को सिर्फ नपाध्यक्ष बनाम एसडीएम का मामला बनाकर देखना असली मुद्दे से ध्यान भटकाना होगा। असली मुद्दा नगर पालिका का कामकाज है। आम जनमानस के जेहन मे यह सवाल हिलोरें मार रहा है कि विकास कार्यों पर कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ, किस ठेकेदार को काम मिला, काम की गुणवत्ता किसने जांची, भुगतान किस आधार पर हुआ और शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? यदि सब कुछ पाक-साफ है तो अभिलेख खोलिए, जांच कराइए और आरोपों को गलत साबित कीजिए।लेकिन यदि जांच के दरवाजे पर पहुंचते ही सवाल करने वाले अधिकारी के अधिकार पर सवाल खड़े होने लगें, तो जनता के मन में उठने वाले सवालों को कौन रोकेगा? नगर पालिका में अब लड़ाई सिर्फ निरीक्षण की नहीं है। लड़ाई उस व्यवस्था की है, जहां जनता के पैसे का हिसाब जनता को चाहिए और इस हिसाब से नपाध्यक्ष किरन जायसवाल से लेकर ईओ तक सभी जिम्मेदार अधिकारी को जवाब देना ही होगा।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य



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