47 लाख की चाय पी गए साहब, RTI ने खोली सरकारी फिजूलखर्ची की पोल

🔴अतिक्रमण हटाने निकले थे या दावत उड़ाने? चाय-नाश्ते का बिल 47 लाख, जनता के टैक्स पर 'चाय महोत्सव'

🔵युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

 राजकोट। देश में जहां आम आदमी महंगाई, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं सरकारी तंत्र की फिजूलखर्ची का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने लोगों को हैरान कर दिया है। गुजरात के राजकोट नगर निगम(आरएमसी) में अतिक्रमण विरोधी अभियान के नाम पर अधिकारियों और कर्मचारियों के चाय-नाश्ते पर कथित तौर पर 47 लाख रुपये खर्च किए जाने का खुलासा हुआ है। सूचना के अधिकार  के तहत सामने आए इस आंकड़े ने सरकारी खर्चों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सोचिए, जिस देश में कई सरकारी स्कूलों में बच्चों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाए रही है, जहां अस्पतालों में दवाओं की कमी की शिकायतें जगजाहिर हैं, वहां अतिक्रमण हटाने निकली सरकारी टीम के जलपान पर 47 लाख रुपये खर्च हो जाएं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ऐसा कौन सा नाश्ता था जिसकी कीमत लाखों में पहुंच गई? क्या अधिकारियों को सोने-चांदी की थालियों में भोजन परोसा गया? क्या चाय में केसर, बादाम और विदेशी मसालों का इस्तेमाल हुआ? या फिर सरकारी फाइलों में खर्च का ऐसा खेल खेला गया जिसकी परतें अभी खुलनी बाकी हैं?


बतादे कि नगर निगम द्वारा शहर में चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान अभियान में शामिल अधिकारियों, कर्मचारियों और सहयोगी टीमों के खान-पान का खर्च सरकारी खाते में दर्ज किया गया। लेकिन जब खर्च का ब्यौरा सामने आया तो लोगों की आंखें फटी रह गईं। महज चाय, नाश्ता और जलपान पर 47 लाख रुपये खर्च होने का दावा किया गया है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में ऐसा कौन सा विशेष भोजन परोसा गया, जिसकी कीमत लाखों रुपये तक पहुंच गई? क्या अधिकारियों को पांच सितारा होटल जैसी सुविधाएं दी गईं या फिर सरकारी धन के उपयोग में कहीं गंभीर अनियमितता हुई है? यही सवाल अब जनता और सामाजिक संगठनों द्वारा उठाए जा रहे हैं। आरटीआई के खुलासे के बाद विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि जनता के टैक्स के पैसे का इस तरह इस्तेमाल न केवल वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है बल्कि सरकारी व्यवस्था की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह खर्च वास्तविक है तो यह सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण है, और यदि आंकड़ों में गड़बड़ी है तो यह वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है। दोनों ही स्थितियों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

विडंबना यह है कि नगर निगम अक्सर बजट की कमी का हवाला देकर शहर की सड़कों, नालियों, सफाई व्यवस्था और अन्य जनसुविधाओं के लिए संसाधनों का अभाव बताता है। लेकिन जब चाय-नाश्ते पर ही लाखों रुपये खर्च होने लगें तो जनता का यह पूछना स्वाभाविक है कि आखिर उनके टैक्स का पैसा जा कहां रहा है। राजकोट का यह मामला केवल एक नगर निगम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक बनता जा रहा है जिसमें सरकारी धन को अपनी निजी सुविधा समझकर खर्च किया जाता है। अब आम लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और जांच एजेंसियां इस मामले में क्या कार्रवाई करती हैं और क्या जनता के पैसों का हिसाब देने वालों से वास्तव में जवाब मांगा जाएगा।





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