किसने बुझा दी पूर्वांचल की औद्योगिक मशाल? कप्तानगंज डिस्टलरी का जिम्मेदार कौन

 

🔵एशियाई पहचान वाली डिस्टलरी के अंत का जिम्मेदार कौन? 

🔴एशिया में पहचान, पूर्वांचल की शान... फिर किसकी नजर लगी कि खंडहर बन गई उद्योग की यह विरासत?

🔵युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। कभी जिसकी चिमनी से उठता धुआं विकास का संदेश देता था, जहां मशीनों की गड़गड़ाहट से हजारों घरों में चूल्हे जलते थे, जहां रोजगार की आस में लोगों की पीढ़ियां जुड़ी थीं, आज वही कप्तानगंज डिस्टलरी वीरान खड़ी है। कभी एशियाई स्तर पर पहचान रखने वाली यह औद्योगिक इकाई अब अपने अस्तित्व की मोहताज बन चुकी है। जर्जर इमारतें, उखड़े ढांचे और पसरा सन्नाटा मानो चीख-चीखकर पूछ रहा है "आखिर कप्तानगंज डिस्टलरी को खत्म करने वाला कौन है?"


बतादे कि करीब 49 एकड़ क्षेत्र में फैली इस डिस्टलरी की स्थापना वर्ष 1944-45 में हुई थी। आजादी के बाद यह पूर्वांचल की औद्योगिक क्रांति का प्रमुख केंद्र बनी। हजारों श्रमिकों को रोजगार मिला, गन्ना किसानों को बाजार मिला और कप्तानगंज की पहचान पूरे देश में बनी। लेकिन वर्ष 2008 में इसकी चिमनी से आखिरी बार धुआं निकला और उसके बाद उत्पादन हमेशा के लिए ठप हो गया।सवाल यह है कि जो कारखाना दशकों तक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा, वह अचानक मौत के मुंह में कैसे चला गया? क्या इसे बचाने की कोशिश नहीं की गई, या फिर जानबूझकर इसे बर्बादी की ओर धकेला गया? आखिर वे कौन लोग हैं जिनकी लापरवाही, गलत फैसलों या स्वार्थ ने इस औद्योगिक धरोहर को खंडहर बना दिया? कहना ना होगा कि डिस्टलरी बंद होने के साथ ही हजारों परिवारों की रोजी-रोटी छिन गई। श्रमिक बेरोजगार हो गए, किसान प्रभावित हुए और स्थानीय व्यापार चौपट हो गया। जिन लोगों ने अपनी जवानी इस कारखाने को दी, वे आज भी अपने हक और बकाये की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नजर नहीं आता।सबसे बड़ा दर्द यह है कि डिस्टलरी के बंद होने के बाद उसकी संपत्तियां धीरे-धीरे गायब होती चली गईं। मशीनें कबाड़ बन गईं, भवन उजड़ते गए और जिम्मेदार तमाशबीन बने रहे। करोड़ों रुपये की संपत्ति और हजारों लोगों के भविष्य से जुड़ा यह संस्थान आखिर किसकी नाकामी का शिकार हुआ, इसका जवाब आज तक नहीं मिला। स्थानीय समाजसेवी व भ्रष्टाचार के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने वाले राम नरेश अग्रहरी का कहना है कि चीनी मिलों और अन्य औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने की योजनाएं बन सकती हैं, तो कप्तानगंज डिस्टलरी को क्यों मरने दिया गया? क्या इसकी जमीन और संपत्तियों पर किसी की नजर थी? क्या प्रशासन, प्रबंधन और संबंधित एजेंसियों ने अपनी जिम्मेदारियां निभाईं? ऐसे तमाम सवाल आज भी जवाब मांग रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूर्वांचल के विकास का प्रतीक रही कप्तानगंज डिस्टलरी आज सरकारी उदासीनता, प्रबंधन की विफलता और नीतिगत लापरवाही की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है। इसकी वीरान चिमनी सिर्फ एक बंद कारखाने की कहानी नहीं कहती, बल्कि यह उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है जो एक ऐतिहासिक औद्योगिक धरोहर को बचा नहीं सकी।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

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