लोकायुक्त के जांच मे घिरे डीआईओएस ने आईजीआरएस को बना दिया मजाक

 

🔵कनोडिया इंटर कॉलेज का काला खेल: फर्जी हाजिरी, लाखो का एरियर भुगतान, फर्जी नौकरी और आईजीआरएस पर सच का गला घोंटते डीआईओएस का कारनामा 

🔵सच दबाने की साजिश या विभागीय संरक्षण? कनोडिया इंटर कॉलेज प्रकरण में डीआईओएस कठघरे में 

🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। लोकायुक्त की जांच में पहले से घिरे जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। इस बार मामला सिर्फ वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (आईजीआरएस) पर शिकायतों के फर्जी निस्तारण और तथ्य छिपाकर शासन को गुमराह करने का है। आरोप इतने गंभीर हैं कि स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो जाए तो डीआईओएस और आरोपी शिक्षको की कारस्तानी की कई परतें खुल सकती हैं।


जनपद के कप्तानगंज स्थित श्री गंगा बक्श कनोडिया इंटर कॉलेज इन दिनों शिक्षा का मंदिर कम और कथित भ्रष्टाचार का अड्डा के रूप में ज्यादा चर्चा में है। सबब यह है कि विद्यालय के सहायक अध्यापक श्याम नारायण पाण्डेय, वीरेन्द्र पाण्डेय और बर्खास्तगी के बाद कथित रूप से तथ्य छिपाकर नौकरी कर रहे देवेन्द्र पाण्डेय पर फर्जीवाड़े, सरकारी धन की लूट और नियमों को धता बताकर लाभ लेने के गंभीर आरोप लगे हैं।इन शिक्षकों का विनियमितीकरण वर्ष 2018 में हुआ है, लेकिन चयन वेतनमान का लाभ वर्ष 2008 से ही लिया जा रहा है। यानी कि जिस सुविधा का लाभ इन शिक्षको को वर्ष 2028 में मिलना था, उसका लाभ इन शिक्षको द्वारा फर्जी तरीके से बीस वर्ष पहले से ही उठाते हुए सरकारी खजाना लूटा जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ? और यदि हुआ तो किसकी शह पर हुआ ? बताया जा रहा है कि कूटरचित अभिलेखों और फर्जी तथ्यों के आधार पर चयन वेतनमान स्वीकृत कराया गया। इतना ही नहीं, जुलाई 2012 से जून 2014 तक करीब दो वर्षों तक विद्यालय न आने के बावजूद फर्जी उपस्थिति पंजिका के सहारे लाखों रुपये का एरियर भी निकाल लिया गया।अब बड़ा सवाल यह है कि जब मूल उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर नहीं मिले, तो भुगतान किस आधार पर किया गया ? किस अधिकारी ने आंख बंद कर सरकारी धन लुटा दिया?


🔴नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत भी हुआ ध्वस्त

शिक्षा निदेशालय के पत्र दिनांक 13 फरवरी 2023 में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा किये गये स्थलीय जांच में मूल उपस्थिति पंजिका पर संबंधित शिक्षकों के हस्ताक्षर नहीं पाए गए, जिससे उनकी कार्यरतता प्रमाणित नहीं हो रही। ऐसे में “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत के तहत भुगतान नियम संगत नहीं माना गया। इतना ही नही वित्त नियंत्रक (माध्यमिक) उत्तर प्रदेश ने भी अपने पत्र में साफ निर्देश दिया था कि किसी भी प्रकार का अनियमित या दोहरा भुगतान होने पर संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षक और वित्त एवं लेखाधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। बावजूद इसके भुगतान हुआ और अब पूरा मामला सवालों के घेरे में है।


🔴आईजीआरएस पर ‘फर्जी निस्तारण’ का आरोप 

सबसे चौंकाने वाला तत्थ यह है कि शिकायतों की गंभीरता के बावजूद जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त ने आईजीआरएस पर तथ्य छिपाकर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। आरोप है कि इन शिक्षको पर कार्रवाई करने के बजाय डीआईओएस ने आरोपी शिक्षकों का बचाव किया और पूरा मामला लीपापोती में बदल दिया। सूत्रों की मानें तो जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त द्वारा कनोडिया इंटरमीडिएट कालेज के प्रधानाचार्य से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट में मूल उपस्थिति पंजिका ( जिस पर आरोपी तीनो शिक्षको का जुलाई 2012 से जून 2014 तक हस्ताक्षर नही है), तत्कालीन डीआईओएस की जांच रिपोर्ट, शिक्षा निदेशक के पत्र और वित्त नियंत्रक के आदेश सहित करीब 26 पन्नों के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। इन दस्तावेजों में  श्याम नरायण पाण्डेय, विरेन्द्र पाण्डेय व बर्खास्तगी के बाद तथ्य गोपन कर नौकरी कर रहे सहायक अध्यापक देवेन्द्र पाण्डेय की कथित फर्जीवाड़े के ठोस साक्ष्य मौजूद थे। लेकिन  डीआईओएस ने उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को दबा दिया और मात्र एक पन्ने की आख्या अपलोड कर आईजीआरएस पर शिकायत का निस्तारण कर दिया। अब सवाल यह है कि आखिर किस दबाव या संरक्षण में यह खेल खेला जा रहा है ? शिक्षा विभाग के जानकारों का कहना है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हुई तो सिर्फ तीनो शिक्षक ही नहीं बल्कि कई अधिकारियों की भूमिका भी उजागर हो सकती है।जिले में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि आखिर कौन सी ताकत है जो इन शिक्षको के खिलाफ कार्रवाई को रोक रही है? क्यों अब तक इनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज नही हुआ , अब तक रिकवरी क्यो नही हुई? और क्यो अब तक डीआईओएस द्वारा इन शिक्षको के खिलाफ विभागीय कार्रवाई नही की गई?

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

Post a Comment

Previous Post Next Post