दबंगों की दबंगई में टूटा छत का सपना, दिव्यांग महिला अनशन पर

🔵पीएम आवास का सपना टूटा, खुले आसमान के नीचे दिव्यांग का सत्याग्रह शुरू 

🔴ठंड, भूख और खामोशी के बीच एक सवाल—क्या यही है सुशासन?

🔴 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। जनपद के रामकोला थाना क्षेत्र के  सिंगहा गांव की दिव्यांग महिला अल्पना तिवारी सोमवार को अपने ही घर के सामने अनशन पर बैठ गईं है। खुले आसमान के नीचे बैठी अल्पना की खामोशी,शासन-प्रशासन के नेकनीयत कार्यशैली पर सवाल खडा करती  है।

बेशक! अल्पना दिव्यांग है, लेकिन उनकी उम्मीद कभी लाचार नहीं थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जब मकान स्वीकृत हुआ, तो लगा कि अब ज़िंदगी थोड़ी आसान होगी। उन्हें विश्वास हुआ कि सरकार ने आखिरकार उनकी पीड़ा देख ली है। लेकिन यह भरोसा ज्यादा दिन तक नही टिक सका। आरोप है कि पुलिस दबाव और दबंग विपक्षियों की मिलीभगत से निर्माण कार्य जबरन रुकवा दिया गया। एक पल में ही घर का सपना फिर से सड़क पर आ गिरा। महीनों से अल्पना खुले आसमान के नीचे रह रही हैं। ठंड की रातें उनके लिए सबसे बड़ी सज़ा बन गई हैं। कहना ना होगा कि न्याय की आस में अल्पना ने हर दरवाजा खटखटाया जिलाधिकारी, उच्च अधिकारी, मुख्यमंत्री। जब कहीं से आवाज़ नहीं आई, तो राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उन्होंने इच्छामृत्यु की मांग की। यह कोई सनक नहीं थी, बल्कि एक थकी हुई आत्मा की चीख थी, जिसे जीने की वजह छीन ली गई थी।

आज अनशन पर बैठी अल्पना किसी से लड़ नहीं रही हैं। वह बस इंतज़ार कर रही हैं शायद कोई अधिकारी आए,उसकी फरियाद कोई सुने, सरकारी तंत्र के लोग कहे कि “ योगी सरकार मे वह अकेली नहीं हैं।” लेकिन अब तक सिर्फ़ सन्नाटा है। न जांच, न कार्रवाई, न संवेदना।अल्पना का कहना है“मैं सरकार से कुछ  नहीं मांग रही। बस इतना चाहती हूं कि जो मुझे दिया गया है, वह मुझे जीने दिया जाए।”यह मामला सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही का नहीं है। यह मानवीय संवेदना की विफलता है। ऐसे मे सवाल लाजमी है कि क्या योजनाएं सिर्फ़ काग़ज़ों के लिए हैं, और गरीब का जीवन सिर्फ़ आंकड़ों के लिए? जब एक दिव्यांग महिला खुले आसमान के नीचे अनशन पर बैठती है, तो   सिस्टम खुद-ब-खुद कटघरे मे आ जाता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ की सरकारी मशीनरी क्या करती है।



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