महिला सम्मान के दावों पर सवाल : दिव्यांग अल्पना चार दिन से भूखी, प्रशासन बेखबर - Yugandhar Times

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Thursday, January 8, 2026

महिला सम्मान के दावों पर सवाल : दिव्यांग अल्पना चार दिन से भूखी, प्रशासन बेखबर

🔴संवेदनहीन प्रशासन का चेहरा बेनकाब : न्याय के लिए अनशन से जूझ रही दिव्यांग महिला 

🔵इच्छामृत्यु की गुहार भी बेअसर: दबंगों के आगे बेबस दिव्यांग महिला

🔴 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। महिला सम्मान, सुरक्षा और संवेदनशील शासन के खोखले दावों पर कुशीनगर जनपद के रामकोला थानान्तर्गत सिंगहा गांव की दिव्यांग महिला अल्पना तिवारी एक ऐसा जीता-जागता सवाल बन गई है, जिसका जवाब शासन-सत्ता के पास नहीं भी है। दिव्यांग अल्पना तिवारी चल फिर नही सकती है वह कदम कदम पर  सहारे की मोहताज है जो पिछले चार दिनों से खुले आसमान के नीचे भूखी-प्यासी अनशन पर बैठी है। यह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि व्यवस्था के पत्थरदिल चेहरे पर मारी गई करुणा की सबसे तीखी चोट है। 

बतादे कि दबंगों की दबंगई ने दिव्यांग अल्पना की जीवन तबाह कर दिया है। उसने न्याय के लिए थाने से कलेक्ट्रेट तक, अफसरों से जनप्रतिनिधियों तक, मुख्यमंत्री से लेकर देश के राष्ट्रपति तक दरवाज़ा खटखटाया लेकिन हर जगह उसे सिर्फ खामोशी, टालमटोल और बेरुखी मिली। जब इंसाफ की उम्मीदें दम तोड़ने लगीं, तो उस दिव्यांग महिला ने जीने के अधिकार से ही हाथ खींच लेने का फैसला कर लिया और राष्ट्रपति से इच्छामृत्यु की गुहार लगा दी। यह उसकी कमजोरी कहे या फिर उसकी पीड़ा  जहां उसकी ज़िंदगी खुद बोझ बन गयी है। शर्मनाक पहलू यह है कि इच्छामृत्यु की अर्जी भी प्रशासन की कुंभकर्णी निद्रा को नहीं तोड़ सकी। न कोई जिम्मेदार उसकी पीडा सुनने उसके पास पहुंचा, न किसी ने संवेदना का ढाढस बढाया। चार दिनों से खुले आसमान के नीचे अनशन पर बैठी अल्पना का सूखता गला, कांपता शरीर और बुझती आंखें पूछ रही हैं क्या दिव्यांग होना इस सिस्टम में सबसे बड़ा अपराध है? कहना ना होगा कि अल्पना तिवारी अपने जीवन को दांव पर लगाकर सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस बेबस महिला के लिए लड़ रही है, जिसे दबंगों द्वारा कुचल दिया जाता हैं और सिस्टम अनदेखा कर देता है। अगर समय रहते उसकी सुनवाई नहीं हुई और अनशन के दौरान उसकी जान को कुछ हुआ, तो यह सिर्फ एक हादसा नहीं होगा यह प्रशासनिक संवेदनहीनता से किया गया संगठित अन्याय माना जाएगा।अभी भी समय है। अल्पना तिवारी की करुण पुकार अनसुनी होती रही, तो यह साफ हो जाएगा कि महिला सम्मान सिर्फ मंचों की तालियों तक सीमित है, और ज़मीनी सच्चाई में इंसानियत को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया गया है।



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