सुरक्षा परिषद मे भारत की दावेदारी का पक्ष

🔴 डा0 सुधाकर कुमार मिश्र 

वैश्विक पटल एवं राष्ट्रीय स्तर पर हमारी राष्ट्रीय सरकार का कार्य एवं उपादेयता महत्वपूर्ण एवं प्रशंसा के योग्य है ।ऐसे करिश्माई नेतृत्व की सरकार का चुना जाना जनता में नेतृत्व के प्रति विश्वास एवं आस्था को बढ़ाना है। लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक शासन की मजबूती इस मूल्य में निहित है कि हमारी सरकार जनता के मूल्य ,जनता के विश्वास बढ़ाने में किस स्तर तक सक्षम है ?हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री ने कोरोना संकटकाल में संयुक्त राष्ट्र संघ की अकर्मण्यता पर आवाज उठाकर वैश्विक समस्या को वैश्विक संकट के परिप्रेक्ष्य  उठाया है में उठाया है ।

बेशक ! देश के प्रधानमंत्री की अभिव्यक्ति भारतवर्ष के एक अरब 29 करोड़ लोगों की आवाज है । लोकतंत्र में शासन प्रमुख का आवाज जनता की आवाज होती है; क्योंकि वह जनता के प्रति उत्तरदायी होता है।  प्रधानमंत्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि जिस वैश्विक संगठन के निर्माण ,लोकतांत्रिक करण ,वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान करने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाया ,उस राष्ट्र- राज्य को वैश्विक संगठन के संरचना और निर्णय- निर्णय प्रक्रिया से ,सुरक्षा परिषद से कब तक बाहर रखा जा सकता है ?भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की समस्त सदस्यता के सभी मानदंडों को पूरा करता है। 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्माण के समय की परिस्थितियां वर्तमान परिस्थिति से अलग थी ।उस समय दुनिया द्विध्रुवी विश्व व्यवस्था में थी ,वैश्विक स्तर पर विचार धाराओं का द्वंद था; वैश्विक स्तर पर परमाणु हमला हो चुका था; एवं प्रमाण परमाण्विक हमले की भयावहता बनी थी। औपनिवेशिक दासता का माहौल था एवं संसार आर्थिक पराधीनता की ओर बढ़ रहा था ।विश्व द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से उभर रहा था एवं विश्व के देश लोकतांत्रिक मजबूती की दिशा में अग्रसर थे । राष्ट्रका पुनर्निर्माण हो रहा था। नवोदित राष्ट्र विचारधाराओं के समीकरण में उहापोह की स्थिति में जकड़े थे। वैश्विक पटल पर उपनिवेशवाद खत्म हो रहा था । पिछले वैश्विक परिदृश्य में शीत युद्ध का दौर देखा, शीत युद्ध का अवसान भी देखा ,एवं गुटी करण की राजनीति को भी देखा था। नाटो का गठन, नाटो का विस्तार, नाटो का भूमंडलीकृत संसार में राजनीतिक एवं सैनिक प्रभाव था । नाटो के प्रत्युत्तर में 'वारसा पैक्ट' का गठन, वारसा पैक्ट का प्रभाव, वारसा पैक्ट का विचारधारात्मकप्रभाव देखा गया ।दोनों सामरिक संगठनों का वैश्विक राजनीति पर प्रभाव ,वैश्विक राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित करने की भूमिका ,सकारात्मक एवं नकारात्मक उपादेयता, सकारात्मक एवम नकारात्मकभूमिका ने संयुक्त राष्ट्र के कार्य संस्कृति, संगठन एवं शांति रक्षक की भूमिका को प्रभावित किया ;जिसमें भारत की भूमिका यथेष्ट एवं प्रभाव कारी थी। वर्तमान परिदृश्य में भारत की राजनीतिक स्थिरता मोहब्बत महत्वपूर्ण कारक है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत ने एक 'सशक्त राजनीतिक नेतृत्व 'को प्रदान किया है ।

भारत ने वैश्विक स्तर पर" मजबूत अर्थव्यवस्था" अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गुणात्मक समृद्धि ,अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भारत का बदलता रुख,आंतरिक सुरक्षा में मजबूती ,पारदर्शी सरकार के रूप  में, स्वच्छ भारत से उन्नयन भारत  के रूप में,ग्रामीण भारत पर विशेष केंद्रीकरण, नीति आयोग संस्था का अस्तित्व जो सहकारी संघवाद को मजबूती प्रदान कर रही है ।राजनीतिक स्थिरता से विदेशी मुद्रा भंडार का आगमन होता है ;जिससे देश की समृद्धि बढ़ती है ।इस आधार पर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण दावेदारी प्रस्तुत कर रहा है। 24 अक्टूबर ,1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म हुआ था, तब चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों की संख्या 50 थी ;लेकिन वर्तमान में सभ्य राष्ट्र- राज्यों की संख्या 193 हो गई है ।इस आधार पर भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव होना चाहिए, राष्ट्र राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रदान करने के लिए भी बदलाव होना चाहिए ।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की शक्ति का प्रयोग करने वाले राज्यों की संख्या 5 थी; जो आज भी है ।यू एन ओ के निर्माण के 75 वें वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार किया जाए जो वैश्विक समस्या का समाधान एवं वैश्विक स्तर पर संतुलन को कायम कर सके ।भारतवर्ष दुनिया की शांति ,सुरक्षा और समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध है। भारत मानवता के हितार्थ एवं मानवीय सेवा के लिए प्रतिबद्ध है ।भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का संस्थापक सदस्य होने के नाते वैश्विक शांति, सुरक्षा एवं हित वृद्धि के लिए संकल्पित है एवं वैश्विक स्तर पर जन समस्याओं को समाधान करके 'लोक कल्याण' की भावना को बढ़ाकर समाधान कर रहा है।



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  1. भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन में दावेदारी बनती है।

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