🔴कानूनगो के कारस्तानी का वीडियो वायरल होते ही कप्तानगंज तहसील में मचा हड़कंप
🔵युगान्धर टाइम्स व्यूरो
कुशीनगर। जनपद के कप्तानगंज तहसील क्षेत्र में राजस्व विभाग की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के कटघरे में खड़ी हो गई है। यहां जमीन की पैमाइश अब सरकारी प्रक्रिया कम और ‘सेटिंग’ का खेल ज्यादा नजर आने लगी है। ताजा मामला सिर्फ आरोपों तक सीमित नहीं है बल्कि एक वायरल वीडियो ने पूरे सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे इस वीडियो में कथित तौर पर कानूनगो ओमप्रकाश पाण्डेय बोदरवार के एक किसान से खेत की पैमाइश के नाम पर पैसे लेते हुए नजर आ रहे हैं।हालांकि प्रशासन ने अभी तक वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन वीडियो के सामने आते ही क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। गांव-गांव में लोग इस वीडियो को देखकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब सरकारी नाप-जोख भी खुलेआम सौदेबाजी का हिस्सा बन चुका है?
गांवों से उठ रही आवाजें बता रही हैं कि राजस्व विभाग में काम करवाना अब आम आदमी के बस की बात नहीं रह गई।गांवों से लेकर तहसील मुख्यालय तक एक ही चर्चा है “बिना पैसा का कुछ नहीं होगा।” किसानों का कहना है कि पैमाइश के लिए आवेदन करने के बाद उन्हें बार-बार तारीखें दी जाती हैं। कभी कर्मचारी नहीं आते, कभी फाइल में कमी निकाल दी जाती है, तो कभी नया बहाना बनाकर काम टाल दिया जाता है, लेकिन जैसे ही ‘खर्चा-पानी’ का इंतजाम होता है, वही काम फुर्ती से निपटा दिया जाता है।
नई नही है सरकारी मशीनरी की घूस लेने की कारस्तानी
किसानों का कहना है कि यह वीडियो कोई नई कहानी नहीं दिखा रहा, बल्कि उस कड़वी सच्चाई को उजागर कर रहा है जिसे वे वर्षों से झेलते आ रहे हैं। उनका आरोप है कि कप्तानगंज तहसील में पैमाइश जैसे कार्य बिना “लेन-देन” के पूरे ही नहीं होते।आवेदन देने के बाद उन्हें महीनों तक दौड़ाया जाता है, लेकिन जैसे ही पैसे दिए जाते हैं, फाइलें तेजी से आगे बढ़ने लगती हैं। वायरल वीडियो ने इन आरोपों को और मजबूती दे दी है। अब सवाल सिर्फ कानूनगो पर नहीं, बल्कि पूरे तंत्र पर उठ रहे हैं। अगर एक कानूनगो खुलेआम कैमरे में घूस लेते नजर आ रहा है, तो क्या यह संकेत काफी नहीं कि सिस्टम के भीतर कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की जड़े गहराई तक जम चुकी है?
राशि तय होने पर जमीन पर गिरती है जरीब
यह कोई एक-दो लोगों की शिकायत नहीं, बल्कि एक पूरी श्रृंखला बन चुकी है, जिसमें छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े स्तर के अधिकारियों तक, सबकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। किसानों का आरोप है कि यह ‘अवैध नियम’ अब इतना मजबूत हो चुका है कि बिना पैसे दिए काम करवाना लगभग असंभव हो गया है। स्थानीय किसानों का कहना है कि खेत की पैमाइश जैसी बुनियादी प्रक्रिया अब “राशि तय होने” पर ही आगे बढ़ती है। बिना चढ़ावे के न तो तारीख मिलती है और न ही नाप के लिए जरीब जमीन पर गिरती है।
सिस्टम के कार्यशैली पर सवाल
इस घटना के बाद प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। क्या निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है? क्या शिकायतों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता रहा है? या फिर यह सब एक संगठित ढंग से चल रहा खेल है? किसानों का गुस्सा अब खुलकर सामने आ रहा है। उनका कहना है कि “अगर हमारे ही खेत की नाप के लिए हमें रिश्वत देनी पड़े, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि हमारे हक का खुला हनन है।”

