प्रतिज्ञा ने लिखी साहस की इबारत, फतह किया एवरेस्ट बेस कैंप

 

🔴तिरंगा हाथ में, जीत आंखों में, प्रतिज्ञा ने दुनिया को दिया संदेश

देवरिया की बेटी और कुशीनगर की बहू बनी लाखो युवाओ के लिए प्रेरणा

🔴 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। मंज़िल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, “पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। देवरिया की बेटी और कुशीनगर के बेलवा गांव की बहू प्रतिज्ञा मिश्रा पर यह पक्तियां सटीक बैठती है। सिंगापुर में आईटी प्रोफेशनल के तौर पर काम करने वाली प्रतिज्ञा ने महज 8 दिनों में 5364 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एवरेस्ट बेस कैंप को फतह कर न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे क्षेत्र की पहचान को नई ऊंचाई दी है।

यह सफर किसी आम ट्रेक की कहानी नहीं, बल्कि जिद, जुनून और जज़्बे की मिसाल है। 2 अप्रैल को काठमांडू पहुंचकर 3 अप्रैल से शुरू हुई यात्रा में प्रतिज्ञा ने लुकला से गोरक्षेप तक के खतरनाक रास्तों को पार किया। -16°C की कंपकंपाती ठंड, आधी होती ऑक्सीजन और हर कदम पर एएमएस का खतरा, ये सब उनके हौसलों के आगे बौने साबित हुए।हर दिन 8 से 9 घंटे की कठिन चढ़ाई, 10 से 15 किलोमीटर का सफर, और शरीर की सीमाओं से जूझते हुए भी उनका लक्ष्य एक ही था, एवरेस्ट बेस कैंप। 10 अप्रैल को जब प्रतिज्ञा ने वहां तिरंगा लहराया, तो वह सिर्फ एक शिखर नहीं, बल्कि हौसलों की जीत थी।प्रतिज्ञा कहती हैं, “सपने हर कोई देखता है, लेकिन उनमें जान तभी आती है जब आप उन्हें पूरा करने के लिए खुद को झोंक देते हैं।”भावुक प्रतिज्ञा कहती है “मेरा सपना था कि देवरिया और कुशीनगर का नाम दुनिया के सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचे। ये सिर्फ मेरी नहीं, हर उस लड़की की जीत है जो बड़े सपने देखने की हिम्मत रखती है।”

🔴 दृढ़संकल्प और कडी मेहनत 

कॉरपोरेट जिंदगी की भागदौड़ के बीच इस उपलब्धि को हासिल करना आसान नहीं था। लेकिन सिंगापुर में रहकर की गई तैयारी और मजबूत अनुशासन ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया। इस ट्रेक में उनके साथ भारत की नेहा और फिलीपींस की जेनिस भी शामिल रहीं, जिन्होंने टीमवर्क का शानदार उदाहरण पेश किया।


🔴 गलियों से अंतर्राष्ट्रीय फलक का दौर

देवरिया की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय फलक पर तक पहुंची प्रतिज्ञा की यह कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि सोच बदलने की भी है। वह अपने पति आशीष मिश्रा के साथ ‘दुर्गा फाउंडेशन’ के जरिए 3500 से अधिक ग्रामीण बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ चुकी हैं। यानि उनकी उड़ान सिर्फ खुद तक सीमित नहीं, बल्कि दूसरों को भी आसमान देने की कोशिश है। प्रतिज्ञा की उपलब्धियों ने बेलवा गांव से लेकर देवरिया तक जश्न के माहौल मे सराबोर कर दिया है। एक बेटी ने यह साबित कर दिया कि छोटे शहरों की पहचान छोटी नहीं होती, बस हौसले बड़े होने चाहिए। ऐसे मे कहना मुनासिब होगा कि एवरेस्ट बेस कैंप पर तिरंगा थामे खड़ी प्रतिज्ञा की तस्वीर अब एक संदेश के साथ साथ प्रेरणा की  प्रतीक बन गयी है।

🔴 ग्लोबल मंच तक का सफर

देवरिया में जन्मी प्रतिज्ञा ने अपनी शुरुआती पढ़ाई यहीं से पूरी की और गोरखपुर विश्वविद्यालय से बायोटेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर किया। इसके बाद उन्होंने आईटी सेक्टर में कदम रखा और आज सिंगापुर में प्रतिष्ठित कंपनी में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

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