"न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने इस फैसले के जरिए कानून की सर्वोच्चता का परचम एक बार फिर लहरा दिया है। उन्होंने सत्ता के गलियारों को यह साफ संदेश दे दिया है कि तुम्हारी लाठी में कितना भी दम क्यों न हो, जब न्याय का हथौड़ा चलेगा, तो तुम्हारी तानाशाही की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगी। देश किसी नेता या पार्टी की सनक से नहीं, बल्कि संविधान और कानून की सर्वोच्चता से चलेगा, और जो भी खाकीधारी इस रास्ते में बाधा बनेगा, उसे न्यायपालिका के इस वज्रपात को सहने के लिए तैयार रहना होगा।,,
🔵बृजबिहारी त्रिपाठी
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में जब 'कानून के राज' और 'शासक के मिजाज' के बीच सीधा टकराव होता है, तो सबसे पहला बलिदान संस्थागत शुचिता का होता है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा प्रशासनिक आबोहवा में न्याय की अवधारणा जिस तरह दम तोड़ रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। सत्ता के गलियारों से निकलने वाले मौखिक आदेशों को जब पुलिस अपनी गीता, बाइबल और कुरान मान लेती है, तब समाज में एक ऐसी अराजकता का जन्म होता है जिसे 'स्टेट स्पॉन्सर्ड टेरर' या राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस गहरे अंधकार के बीच, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तल्ख और बेबाक टिप्पणियां उस बुझती हुई लोकतांत्रिक चेतना को हवा दे रही हैं, जो खाकी के जूतों तले कुचली जा रही थी।
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ के समक्ष आया 'राजेंद्र त्यागी एवं दो अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' का मामला महज एक अदालती मुकदमा नहीं है। यह असल में देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य की पुलिस व्यवस्था के नैतिक और कानूनी दिवालियापन का एक्सरे है। यह मामला एक बानगी है कि कैसे सत्ता की चौखट पर नाक रगड़ने वाली पुलिस, किसी रसूखदार के इशारे पर, कानून की किताबों को अपने स्वार्थ के तेजाब से पिघला देती है। मामले की तह में जाएं तो रूह सिहर उठती है कि कैसे एक सामान्य नागरिक का जीवन पुलिस की एक कलम की नोक से तबाह किया जा सकता है। विवाद पूरी तरह से एक सिविल प्रॉपर्टी और कमर्शियल लेन-देन का था—एक ऐसा मामला जिसका फैसला साक्ष्यों के आधार पर दीवानी अदालत को करना था। लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस सामान्य मतभेद को एक खूंखार आपराधिक साजिश का जामा पहना दिया। पुलिस ने कानून की मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए एक ही परिवार के तीन सदस्यों—एक बुजुर्ग पिता, उनके बेटे और घर की बहू—पर सीधे 'गैंगस्टर एक्ट' मढ़ दिया। गैंगस्टर एक्ट जैसी कठोर और असाधारण धाराएं, जो समाज के दुर्दांत माफियाओं, तस्करों और संगठित अपराधियों के सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करने के लिए बनाई गई थीं, उनका इस्तेमाल एक संभ्रांत परिवार को मानसिक और सामाजिक रूप से जिंदा दफन करने के लिए किया गया। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने पुलिस के इस घिनौने खेल को बेनकाब करते हुए जो कहा, वह सत्ता के नशे में चूर पुलिस कप्तानों के कानों में पिघला हुआ सीसा डालने जैसा है, "यह मूलतः एक सिविल प्रॉपर्टी और कमर्शियल विवाद था, जिसे पुलिस द्वारा जान बूझकर और दुर्भावनापूर्वक आपराधिक रंग दिया गया। एक पूरे परिवार को, जिसमें बहू भी शामिल है, सिर्फ प्रताड़ित करने और घुटनों पर लाने के लिए गैंगस्टर एक्ट का दुरुपयोग किया गया। कानून की धाराओं का ऐसा क्रूर मखौल किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
अदालत का यह तल्ख लहजा सीधे उस व्यवस्था पर चोट करता है जो खुद को कानून से ऊपर समझने लगी है। बहू, बेटे और पिता को एक 'संगठित आपराधिक गिरोह' के रूप में दर्ज करना कानून का क्रियान्वयन नहीं, बल्कि कानून के जरिए किया गया गैंगरेप है—जिसमें अस्मत न्याय की लूटी गई है। यह कोई अकेला या अपवाद स्वरूप मामला नहीं है। उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर देश की सर्वोच्च अदालत से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक लगातार थू-थू हो रही है। अदालतें थक चुकी हैं पुलिस को यह याद दिलाते-दिलाते कि उनका काम कानून का राज स्थापित करना है, न कि सत्ताधारी दल के जिला अध्यक्षों या मंत्रियों के इशारे पर 'सुपारी किलिंग'या 'लीगल एनकाउंटर' की स्क्रिप्ट लिखना।
विभिन्न मामलों में हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस के रवैए पर जो टिप्पणियां की हैं, वे इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि सूबे की पुलिस अब जांच एजेंसी नहीं, बल्कि एक 'हथौड़ा' बन चुकी है, जिसे जहां मन करे, वहां चला दिया जाता है। अदालतों ने पूर्व में भी तल्ख लहजे में कहा है: "ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने आपराधिक न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांतों को भुला दिया है। बिना प्राथमिक जांच के सीधे संगीन धाराएं लगाना, विरोधियों के घरों पर बुलडोजर चलाना और आरोपियों को मीडिया के सामने 'क्रिमिनल' घोषित कर देना एक फैशन बन गया है। पुलिस खुद ही जांचकर्ता, खुद ही जज और खुद ही जल्लाद बनने की आत्मघाती राह पर चल पड़ी है।"
यह टिप्पणियां चीख-चीख कर कह रही हैं कि थानों में अब कानून की संप्रभुता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और राजनीतिक वफादारी का मुजरा हो रहा है। जो दारोगा या कप्तान जितना बड़ा चाटुकार है, उसकी कुर्सी उतनी ही सुरक्षित है। जो अधिकारी कानून की किताब का हवाला देता है, उसे साइडलाइन कर दिया जाता है, और जो नेताओं के पैरों की धूल माथे पर लगाता है, उसे मलाईदार पोस्टिंग से नवाजा जाता है। संविधान निर्माताओं ने जब कार्यपालिका की परिकल्पना की थी, तो उन्होंने सोचा था कि सिविल सर्विसेज और पुलिस बल देश के विकास का 'स्टील फ्रेम' बनेंगे। लेकिन आज यह 'स्टील फ्रेम' पूरी तरह जंग खा चुका है और सियासी आकाओं के इशारे पर किसी भी आकार में मुड़ने को बेताब है। जब पुलिस महानिदेशक से लेकर एक अदना सा सिपाही तक, कानून की सर्वोच्चता को छोड़कर किसी राजनीतिक दल की विचारधारा या किसी व्यक्ति विशेष के प्रति वफादार हो जाता है, तो देश 'पुलिस स्टेट' में तब्दील हो जाता है। राजेंद्र त्यागी के मामले में साफ दिख रहा है कि पुलिस ने दूसरे पक्ष के रसूख और राजनीतिक दबाव के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए थे। विरोधी पक्ष को फायदा पहुंचाने के लिए, सिविल कोर्ट की लंबी प्रक्रिया से बचाने के लिए, पुलिस ने शॉर्टकट का सहारा लिया। एक परिवार को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाकर, उन्हें समझौते के लिए मजबूर करना—क्या यही उत्तर प्रदेश का 'रामराज्य' है? यह रामराज्य नहीं, बल्कि वर्दी की आड़ में खेला जा रहा शुद्ध 'राक्षस राज' है। आज उत्तर प्रदेश के थानों में यह एक संगठित उद्योग बन चुका है। जमीन का विवाद हो, मकान खाली कराना हो, या किसी व्यापारिक साझेदार से पैसा वसूलना हो—न्यायालय जाने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता। सीधे खाकी को 'सुपारी' दी जाती है। पुलिस पहले मामले को घुमाती है, फिर उसमें रंगदारी, धोखाधड़ी और अंत में 'गैंगस्टर' का ऐसा तड़का लगाती है कि सामने वाला व्यक्ति जमानत के लिए तरस जाए।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने इस नस को पूरी तरह पहचान लिया। उन्होंने साफ कर दिया कि जब तक इस तरह के मामलों में जांच अधिकारियों और उनके आकाओं की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह नंगा नाच बंद नहीं होगा। अदालत की इस सख्त टिप्पणी का सीधा संदेश है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि कोई पुलिस अधिकारी अपनी वर्दी का इस्तेमाल किसी राजनीतिक आका को खुश करने या किसी से निजी दुश्मनी निकालने के लिए करेगा, तो उसे अपनी जेब से हर्जाना भी भरना होगा और अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ेगा। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि इस पूरी व्यवस्था का नेतृत्व करने वाले भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी, जो देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करके आते हैं, वे भी इस राजनीतिक कीचड़ में आकंठ डूबे हुए हैं। वे यह भूल चुके हैं कि राजनेता और सरकारें पांच साल की मेहमान होती हैं, लेकिन उनकी वर्दी पर लगा 'अशोक स्तंभ' और उनकी वफादारी सिर्फ और सिर्फ भारत के संविधान के प्रति होनी चाहिए। जब एक आईपीएस अधिकारी सत्ता के सामने नतमस्तक होकर अपनी रीढ़ की हड्डी को उनके पैरों में बिछा देता है, तो नीचे के सब- इंस्पेक्टर और सिपाही से ईमानदारी की उम्मीद करना बेईमानी है। राजेंद्र त्यागी का मामला इसी संस्थागत सड़न का एक छोटा सा हिस्सा है जो सतह पर आ गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ का यह फैसला केवल एक मुकदमे का निस्तारण नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है। यह चेतावनी है उन निरंकुश शासकों को जो पुलिस को अपनी निजी सेना समझते हैं, और यह चेतावनी है उन पुलिस अफसरों को जो कानून की किताब को अपनी जेब में रखकर घूमते हैं।
अब केवल अदालती टिप्पणियों से काम नहीं चलने वाला। अब न्यायपालिका को अपनी अवमानना की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसे भ्रष्ट और वफादारी बदलने वाले अधिकारियों को सीधे जेल की कोठरी में भेजना होगा। जब तक दो-चार बड़े पुलिस अफसरों की वर्दी कोर्ट रूम में नहीं उतरेगी, तब तक खाकी का यह घमंड और यह राजनीतिक वफादारी का नशा नहीं उतरेगा। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने इस फैसले के जरिए कानून की सर्वोच्चता का परचम एक बार फिर हवा में लहरा दिया है। उन्होंने सत्ता के गलियारों को यह साफ संदेश दे दिया है कि तुम्हारी लाठी में कितना भी दम क्यों न हो, जब न्याय का हथौड़ा चलेगा, तो तुम्हारी तानाशाही की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह जाएंगी। देश किसी नेता या पार्टी की सनक से नहीं, बल्कि संविधान और कानून की सर्वोच्चता से चलेगा, और जो भी खाकीधारी इस रास्ते में बाधा बनेगा, उसे न्यायपालिका के इस वज्रपात को सहने के लिए तैयार रहना होगा।
नोट: लेखक वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक चिंतक है।

