“ भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर योग को केवल व्यायाम मानने की धारणा पर दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण व्याख्यानमाला में विद्वानों ने गहन मंथन किया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि योग शरीर को स्वस्थ रखने का साधन भर नहीं, बल्कि मन, आत्मा, समाज और परम सत्य को जोड़ने वाली भारत की सनातन जीवन-पद्धति है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता में समाहित हैं।,,
🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो
नई दिल्ली, । भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण आधार स्तंभ योग की ऐतिहासिक यात्रा और उसकी वैश्विक प्रासंगिकता पर राजधानी दिल्ली स्थित केशवकुंज, झंडेवालान में आयोजित विशेष व्याख्यानमाला में गहन विमर्श हुआ। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रांत एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषय पर विद्वानों ने योग की प्राचीनता, वैज्ञानिकता और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने कहा कि योग भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रकाश स्तंभ है। यह केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने वाली समग्र भारतीय प्रणाली है। उन्होंने कहा कि योग भारतीय आध्यात्मिक चेतना की निरंतरता, समन्वय और स्वास्थ्य का “योजक” है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी वैदिक परंपरा में निहित हैं। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व भारत में विकसित योग आज वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य संरक्षण और रोग नियंत्रण की सबसे विश्वसनीय प्रणालियों में से एक बन चुका है। मानव कल्याण के लिए इससे अधिक समग्र स्वास्थ्य पद्धति विश्व में दुर्लभ है।
🔴सिंधु-सरस्वती सभ्यता से आधुनिक योग दिवस तक की यात्रा
व्याख्यानमाला के मुख्य वक्ता एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति तथा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल ने भारत की योग परंपरा की ऐतिहासिक यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला।उन्होंने कहा कि योग की परंपरा की जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता (2700 ईसा पूर्व) तक जाती हैं। इसके बाद वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग और भक्ति योग की विभिन्न धाराओं से होते हुए यह परंपरा आधुनिक अंतरराष्ट्रीय योग दिवस तक पहुंची है।डॉ. शुक्ल ने कहा कि आज योग भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान बन चुका है। योग की शुचिता और आंतरिक पवित्रता केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज और समष्टि के कल्याण से जुड़ी होती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद्, इतिहासकार एवं पद्मश्री सम्मानित प्रो. बुद्ध रश्मि मणि ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि योग का अंतिम उद्देश्य आत्मा का परम सत्ता से मिलन कराना है।उन्होंने कहा कि आसन और प्राणायाम शरीर तथा मन के बीच संतुलन स्थापित करते हैं, लेकिन योग का दायरा इससे कहीं व्यापक है। योग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी माध्यम है। इसे केवल व्यायाम या शारीरिक क्रियाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। योग का वास्तविक अर्थ जुड़ाव, समन्वय और एकत्व है, जो व्यक्ति को स्वयं, समाज और परम सत्य से जोड़ता है।
🔴बड़ी संख्या में जुटे विद्वान, शोधार्थी और विद्यार्थी
कार्यक्रम का संचालन भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के उपनिदेशक एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख डॉ. सौरभ कुमार मिश्र ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन दिल्ली प्रांत के कार्यकारिणी सदस्य डॉ. संजीव कुमार मिश्र ने प्रस्तुत किया।इस अवसर पर प्रो. सुस्मिता पाण्डेय, सुरेन्द्र हंस, डॉ. नरेंद्र शुक्ल, प्रो. रमेश कुमार मिश्र, शत्रुजीत सिंह, प्रो. धर्मचंद चौबे, प्रो. अखिलेश कुमार दुबे, प्रो. युथिका मिश्र, डॉ. अजय सिंह, डॉ. अस्मित शर्मा, सचिन झा, मुकेश उपाध्याय, डॉ. रमाकांत, डॉ. कौशलेंद्र तथा डॉ. प्रीति उपाध्याय सहित अनेक शिक्षाविद्, इतिहासकार और पदाधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के 150 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थियों ने भाग लिया।

