प्रशासनिक लापरवाही या साजिश? हाईकोर्ट के ‘नो रिलीफ’ से छात्रों का साल बर्बाद - Yugandhar Times

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Tuesday, February 17, 2026

प्रशासनिक लापरवाही या साजिश? हाईकोर्ट के ‘नो रिलीफ’ से छात्रों का साल बर्बाद

  
🔴सिस्टम की गलती, छात्रो को मिली सजा: हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत

🔴 फर्जीवाड़े पर कोर्ट की चोट : सिस्टम के भेट चढे 700 परीक्षार्थियों का भविष्य 

🔵 युगान्धर टाइम्स व्यूरो 

कुशीनगर। पडरौना नगर मे संचालित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज के 700 छात्र इस साल परीक्षा कक्ष की दहलीज तक नहीं पहुंच सकेगें। वजह जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की प्रशासनिक ढिलाई, नोडल अधिकारी की कथित लापरवाही और विद्यालय के प्रधान लिपिक की गैरजिम्मेदाराना कारस्तानी। जब उम्मीद की आखिरी किरण के रूप में यह मामला कोर्ट मे पहुंचा तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी ‘नो रिलीफ’ की टिप्पणी करते हुए परीक्षार्थियों को तत्काल राहत देने से इंकार कर दिया।

 बतादे कि न्यायालय ने आवेदन-पत्रों में पाई गई गंभीर अनियमितताओं को आधार मानते हुए स्पष्ट कर दिया कि परीक्षा प्रक्रिया में नियमों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट के इस सख्त आदेश ने न केवल विद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सैकड़ों छात्रों का पूरा शैक्षणिक वर्ष भी अधर में डाल दिया है। नतीजतन 700 छात्रो का एक साल बिना फेल हुए बर्बाद हो गया।

🔴कैसे फंसा 700 छात्रों का भविष्य?

बताया जा रहा है कि पत्राचार पंजीकरण और परीक्षा से संबंधित औपचारिकताओं में गंभीर अनियमितताएं बरती गईं। समय से ऑनलाइन प्रविष्टियां, सत्यापन और आवश्यक अभिलेख अपलोड नहीं किए गए। आरोप है कि नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी ने निगरानी में कोताही बरती, जबकि प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक स्तर पर कागजी कार्रवाई में भारी चूक हुई।जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय, जो अंतिम सत्यापन की जिम्मेदारी निभाता है, समय रहते खामियों को पकड़ने और सुधारने में विफल रहा। आरोप यह भी है कि बोर्ड परीक्षा के लिए अग्रसारित किए गए आवेदन-पत्रों पर नोडल अधिकारी के अधिकृत हस्ताक्षर नहीं थे। उनकी जगह प्रधान लिपिक द्वारा हस्ताक्षर किये गए थे जिसकी बोर्ड ने जांच कराई, जिसमें हस्ताक्षर फर्जी पाए गए। जांच रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड ने संबंधित आवेदन निरस्त कर दिए।परिणामस्वरूप बोर्ड स्तर पर सात सौ छात्रों का प्रवेश पत्र जारी ही नहीं हो सका। 


🔴परीक्षा छूटी, बिना फेल हुए बर्बाद हुआ एक साल

परीक्षा से वंचित हुए छात्र अब असमंजस में हैं। किसी का सपना सेना में भर्ती का था, किसी को पॉलिटेक्निक या स्नातक में प्रवेश लेना था। कई छात्र आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से हैं, जिनके लिए एक साल का नुकसान सिर्फ शैक्षणिक नहीं, बल्कि आर्थिक और मानसिक आघात भी है।एक छात्र ने कहा, “हमने पूरी तैयारी की थी। गलती अफसरों की थी, सजा हमें मिल गई।” छात्रो व अभिभावकों में भारी रोष है। उनका कहना है कि यदि गलती प्रशासनिक स्तर पर हुई है, तो उसकी सजा छात्रों को क्यों दी जाए? अभिभावको ने मांग किया कि सभी दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए और छात्रों के भविष्य को बचाने के लिए विशेष परीक्षा या अन्य वैधानिक विकल्प तलाशे जाएं।

🔴न्यायालय का सख्त संदेश

न्यायालय के रुख ने साफ कर दिया है कि शैक्षणिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और वैधानिकता सर्वोपरि है। यदि आवेदन-पत्र ही विधिसम्मत नहीं हैं, तो परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक लापरवाही या आंतरिक अनियमितता का खामियाजा नियमों को दरकिनार कर दूर नहीं किया जा सकता।

🔴जिम्मेदार कौन?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आवेदन-पत्रों पर फर्जी हस्ताक्षर हुए, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?क्या नोडल अधिकारी की जानकारी के बिना दस्तावेज अग्रसारित किए गए?डीआईओएस कार्यालय ने समय रहते त्रुटि क्यों नहीं पकड़ी?क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर छात्रो का भविष्य बर्बाद करने का सुनियोजित खेल ?विद्यालय प्रबंधन और शिक्षा विभाग दोनों की भूमिका अब जांच के घेरे में है। यदि हस्ताक्षर फर्जी पाए गए, तो यहछ केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दंडनीय कृत्य की श्रेणी में आता है। फिलहाल हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद छात्रों के सामने अगला शैक्षणिक सत्र ही एकमात्र रास्ता बचा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शासन स्तर पर गंभीर पहल हो, तो विशेष अनुमति या वैकल्पिक परीक्षा की संभावना तलाश की जा सकती है।लेकिन जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक यह मामला शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बना रहेगा।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य



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