शून्य से शिखर तक का सफर: क्यों बेमानी है नेहरू की किसी और से तुलना


" नेहरू की तुलना किसी भी अन्य कालखंड या प्रधानमंत्री से करना तर्कसंगत नहीं है। नेहरू किसी एक दल के नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र के निर्माता थे। आज हम जिस मुकाम पर खड़े होकर दुनिया से आंखें मिला रहे हैं, उस मुकाम का रास्ता नेहरू के विचारों, उनकी संस्थाओं और उनकी दूरदर्शिता की गलियों से होकर ही गुजरता है। इतिहास गवाह है कि कीर्तिमान बदलते रहते हैं, नए रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन जो सभ्यता की नींव रखते हैं, उनका स्थान कालजयी होता है। नेहरू भारत के इतिहास का वही कालजयी अध्याय हैं, जिनकी तुलना की परिधि से परे केवल उनका कृतित्व और व्यक्तित्व ही खड़ा नजर आता है।"

🔵बृजबिहारी त्रिपाठी

​इतिहास कोई ऐसी सपाट स्लेट नहीं है जिस पर जब मर्जी आए, अपनी पसंद के आंकड़े लिख दिए जाएं और पुरानी इबारतों को मिटा दिया जाए। इतिहास एक जीवंत, क्रमिक और बेहद जटिल प्रक्रिया है। समकालीन राजनीतिक विमर्श में इन दिनों एक अजीब सी व्याकुलता दिखती है—हर दौर की तुलना आज के दौर से करने की, हर पुराने शासक के काम को आज के पैमानों पर तौलने की। इस होड़ में सबसे आसान निशाना बनते हैं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू। आज जब हम डिजिटल क्रांति, एक्सप्रेसवे के संजाल, और ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के कीर्तिमानों की चर्चा करते हैं, तो अक्सर यह भूल जाते हैं कि इन गगनचुंबी इमारतों की नींव किस जमीन पर रखी गई थी। आज के रिकॉर्ड्स और आंकड़ों की चमक-दमक के बीच नेहरू के कार्यकाल की तुलना किसी भी अन्य प्रधानमंत्री से करना न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बेमानी है, बल्कि यह उस युग की विभीषिका और संघर्षों के प्रति घोर अन्याय भी है।

​पंडित नेहरू को जब यह देश मिला, तब भारत केवल एक भौगोलिक इकाई भर रह गया था, जिसकी आत्मा को सदियों की गुलामी ने लहूलुहान कर दिया था। वह शून्य का दौर था। आज जब कोई प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है, तो उसे एक स्थापित संविधान, एक कार्यशील नौकरशाही, एक सुदृढ़ सेना, और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था विरासत में मिलती है। लेकिन अगस्त 1947 में नेहरू के सामने क्या था? एक ऐसा देश जो विभाजन की त्रासदी में झुलस रहा था, जहां मजहब के नाम पर इंसानियत का कत्लेआम हो रहा था, और इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन अपनी क्रूरतम शक्ल में सामने खड़ा था। सीमाओं पर शरणार्थियों के अंतहीन काफिले थे, जिनके पास न घर था, न रोटी, और न ही कोई भविष्य। उस भयावह सांप्रदायिक दावानल के बीच एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समावेशी भारत की कल्पना करना और उसे धरातल पर उतारना किसी चमत्कार से कम नहीं था। नेहरू ने उस बारूद के ढेर पर बैठकर न केवल देश को संभाला, बल्कि बिखरी हुई रियासतों को एक सूत्र में पिरोने के सरदार पटेल के भगीरथ प्रयास को वैचारिक और राजनीतिक संबल दिया आर्थिक मोर्चे पर अंग्रेजों ने भारत को एक खोखली और अपाहिज व्यवस्था के रूप में छोड़ा था। दो सौ वर्षों के औपनिवेशिक शोषण ने भारत की पारंपरिक रीढ़ तोड़ दी थी। देश की लगभग अस्सी प्रतिशत आबादी घोर गरीबी की रेखा के नीचे जी रही थी। अकाल और भुखमरी इस देश की नियति बन चुके थे। साक्षरता दर बमुश्किल बारह प्रतिशत थी और औसत आयु मात्र बत्तीस वर्ष। ऐसे घोर अंधकारमय युग में, जहां सुई तक बाहर से मंगवानी पड़ती थी, नेहरू ने आधुनिक भारत की योजना तैयार की। 

आज के दौर में जब 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और निजीकरण की नीतियां मुख्यधारा में हैं, तब यह समझना जरूरी है कि 1950 के दशक में भारत के पास न तो घरेलू पूंजी थी और ना ही निजी क्षेत्र इतना सक्षम था कि वह बुनियादी ढांचे में निवेश कर सके। ऐसे में नेहरू ने 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' का मॉडल चुना और राज्य को विकास का मुख्य इंजन बनाया।पंडित नेहरू ने जिन भारी उद्योगों, बांधों और बिजली परियोजनाओं की शुरुआत की, उन्हें उन्होंने 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था। भाखड़ा नांगल बांध, हीराकुंड, राउरकेला, भिलाई और बोकारो के स्टील प्लांट्स महज़ कंक्रीट और लोहे के ढांचे नहीं थे; वे उस आत्मनिर्भर भारत के संकल्प थे, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए औद्योगिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया। आज यदि भारत दुनिया की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने का दावा करता है, तो उसकी वजह वही भारी उद्योग और बुनियादी ढांचा हैं, जिन्हें नेहरू युग में स्थापित किया गया था। नींव के पत्थरों को नजरअंदाज करके भव्य कंगूरों की तारीफ करना एक सतही राजनीतिक दृष्टिकोण तो हो सकता है, लेकिन गंभीर सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा नहीं हो सकता।

​नेहरू की दूरदर्शिता का सबसे चमकदार प्रमाण शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में उनका निवेश था। जिस देश में करोड़ों लोग निरक्षर हों, जहां अंधविश्वास और रूढ़िवादिता की जड़ें गहरी हों, वहां परमाणु ऊर्जा आयोग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एआईआईएमएस) जैसी संस्थाओं की स्थापना करना एक अकल्पनीय दृष्टिकोण था। होमी जहांगीर भाभा, विक्रम साराभाई और शांति स्वरूप भटनगर जैसे वैज्ञानिकों को नेहरू ने न केवल स्वतंत्रता दी, बल्कि संसाधनों की घोर कमी के बावजूद उनके वैज्ञानिक सपनों को सींचा। आज जब हम इसरो के अंतरिक्ष अभियानों पर गर्व करते हैं या दुनिया भर में भारतीय इंजीनियरों और डॉक्टरों का डंका बजते देखते हैं, तो हमें उस विज़न को सलाम करना होगा जिसने बैलगाड़ी के दौर में भी अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा की बुनियाद रख दी थी।

राजनीतिक और लोकतांत्रिक मोर्चे पर नेहरू का योगदान अद्वितीय है। उनके समकालीन जितने भी देश औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए—चाहे वह पाकिस्तान हो, म्यांमार हो, या अफ्रीका और एशिया के तमाम अन्य देश—वे सभी बहुत जल्द सैन्य तानाशाही या अधिनायकवाद के शिकार हो गए। भारत में भी तमाम तरह की विविधताएं, भाषावार विवाद, और विभाजन की कड़वाहट मौजूद थी। पश्चिम के राजनीतिक विश्लेषक भविष्यवाणी कर रहे थे कि भारत का लोकतंत्र चंद सालों में बिखर जाएगा। लेकिन नेहरू ने लोकतंत्र को भारत की रगों में इस कदर समाहित कर दिया कि वह हमारी जीवन पद्धति बन गया। उन्होंने वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को लागू किया, वह भी तब जब देश की बहुसंख्यक आबादी अनपढ़ थी। उन्होंने खुद को एक प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि संसद के एक अदने सेवक के रूप में प्रस्तुत किया। वे विरोधी स्वरों का सम्मान करते थे। संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी या अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रखर विरोधियों की आलोचनाओं को वे न केवल धैर्यपूर्वक सुनते थे, बल्कि उनकी प्रतिभा की सराहना भी करते थे। लोकतंत्र के प्रति उनकी यह निष्ठा ही थी जिसने भारत को तानाशाही के गर्त में गिरने से बचाया। वैश्विक पटल पर नेहरू ने गुलाम भारत को एक नई पहचान दी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरी दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो ध्रुवों में बंटकर शीत युद्ध की आग में झुलस रही थी, तब नेहरू ने 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' की नींव रखी। यह किसी भी गुट में शामिल न होने की कायरता नहीं थी, बल्कि अपनी संप्रभुता और विदेश नीति को स्वतंत्र रखने का एक साहसिक फैसला था। नव-स्वतंत्र देशों के नेता के रूप में नेहरू की आवाज़ को वैश्विक मंचों पर अत्यंत सम्मान के साथ सुना जाता था। उन्होंने पंचशील के सिद्धांतों के जरिए दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व का संदेश दिया। आज जब भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति का लोहा मनवाता है, तो उसकी जड़ें नेहरू की उसी गुटनिरपेक्षता और संप्रभुता की नीति में खोजी जा सकती हैं।यह सच है कि नेहरू से गलतियां भी हुईं। चीन नीति और 1962 का युद्ध उनके जीवन की सबसे बड़ी कूटनीतिक और सैन्य विफलता थी, जिसने उनके हृदय को गहरा आघात पहुंचाया। कश्मीर के मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के फैसले पर आज भी तीखी बहस होती है। लेकिन क्या किसी महानायक का मूल्यांकन केवल उसकी कुछ चूकों के आधार पर किया जा सकता है? जो कुछ नहीं करते, उनसे कोई गलती नहीं होती। जो राष्ट्र का निर्माण करते हैं, वे कई बार कठिन परिस्थितियों में ऐसे फैसले लेते हैं जिनके परिणाम समय के चक्र में हमेशा अनुकूल नहीं होते। लेकिन उन चूकों की आड़ में उनके समूचे योगदान को खारिज कर देना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। आज के दौर में जो रिकॉर्ड्स और आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं, वे एक विकसित हो चुके तंत्र की स्वाभाविक प्रगति हैं। 

आज की सरकारें जिस डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर या हाइवे नेटवर्क का निर्माण कर रही हैं, वह समय की मांग है और उसके लिए उनके पास प्रचुर संसाधन, वैश्विक तकनीक और एक मजबूत आर्थिक आधार मौजूद है। लेकिन नेहरू के पास केवल एक सपना था, एक अटूट संकल्प था और देश की जनता का अगाध विश्वास था। शून्य से शुरू करके देश को इस मुकाम तक लाने की यात्रा में जो पहला और सबसे कठिन कदम था, वह नेहरू का था।​इसलिए, नेहरू की तुलना किसी भी अन्य कालखंड या प्रधानमंत्री से करना तर्कसंगत नहीं है। नेहरू किसी एक दल के नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र के निर्माता थे। उन्होंने भारत को एक आधुनिक, वैज्ञानिक और तर्कसंगत सोच दी। उन्होंने इस बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश को 'विविधता में एकता' का वो सूत्र दिया, जो आज भी भारत को एक सूत्र में बांधे हुए है। आज हम जिस मुकाम पर खड़े होकर दुनिया से आंखें मिला रहे हैं, उस मुकाम का रास्ता नेहरू के विचारों, उनकी संस्थाओं और उनकी दूरदर्शिता की गलियों से होकर ही गुजरता है। इतिहास गवाह है कि कीर्तिमान बदलते रहते हैं, नए रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन जो सभ्यता की नींव रखते हैं, उनका स्थान कालजयी होता है। जवाहरलाल नेहरू भारत के इतिहास का वही कालजयी अध्याय हैं, जिनकी तुलना की परिधि से परे केवल उनका कृतित्व और व्यक्तित्व ही खड़ा नजर आता है।

नोट- लेखक वरिष्ठ पत्रकार एंव राजनीतिक चिंतक है यह इनका स्वतंत्र विचार है। 

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