चलो रे डोली उठाओ कहार......
🔴 सपना बन कर रह गया दूल्हे की शाही सवारी ‘डोली’ 🔴 नही रहा एहसास कहारों की हंसी ठिठोली 🔴 विलुप्त हो गई डोली 🔴 संजय चाणक्य कुशीनगर! ‘चलो रे डोली उठाओं कहार पिया मिलन की रूत आई!’’ हिन्दी फिल्म का यह गीत आधुनिकता की इस दौड़ में सिर्फ रिल लाईफ तक सिमट कर रह गई है। कभी दूल्हे का शाही सवारी कहे जाने वाली डोली आज अतीत बन गई है। डोली,कहार और शहनाई ....!!ये ऐसे शब्द है जिन्हे सुनकर शायद ही कोई भारतीय युवक एवं युवतियां होगी जिनके मन में कोमल कल्पनायें अठखेलियां न करने लगती हो। युवक-युवती तो दूर अनेक ऐसी वृद्व महिलाएं व पुरूष भी है जो डोली,कहार के नाम सुनते ही अतीत की यादों मेें खो जाते है। और लुप्त हो रही पुरानी प्रथा को याद कर आधुनिक प्रथा को कोसन लगते है। अफसोस लग्जरी कारों के बढ़ते प्रचलन ने इस शाही सवारी को अतीत बना दिया है। यही वजह है कि कहारों की हंसी-ठिठोली के बीच डोली में हिचकोले खाती दुल्हन और दूल्हे के मन में उठने वाली मधुर गुदगुदी के आनन्द से आज के पीढी़ के लोग वंचित होते जा रहे है। फलतः अब तो उस शाही आनन्द की अनुभूति बुर्जुगो के मुंह से सुनकर या फिर हिन्दी फि...